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पहिले जतरा ससुरारी के

विधा:- संस्मरन
पहिले जतरा ससुरारी के।
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एगो अइसन अनुभव जवना के जेहन में अवते खुदही पऽ हंसे के मजबूर हो जानी।

बात तब के हऽ जब हमरा बिआह भइला तीन बरीस बित गइल आ हम ससुरारी ना गइनी। कारन रहे प्राइवेट सेक्टर में नोकरी आ छुट्टी के अभाव।

अइसन ना रहे कि येहि तीन बरीस में हमरा छुट्टी ना मिलल, मिलल पऽ अपनी किहे तब एगो रिवाज रहे नवरतन पुरावे के। येहि रिवाज के मुताबिक जब केहू पहिले बेरी सासुरारी जात रहे तऽ ओकरा ससुरारी में नव दिन आ नव रात रहे के पड़त रहे। अब हमरा येतना लम्बा छुटिये ना मिले कि हम ससुरारी में नवरतन पुराईं।

जब ई बात, हमार ई समस्या ससुराल पक्ष के सोझा परल तऽ ऊ लोग हमरा के आश्वासन दिहलऽ लो कि रउआ आईं, जेतना समय होय ओतने दिन रही , रउआ के केहू बरियाईं ना रोकी।

ई आश्वासन पा के हम ससुरारी जाये बदे तइयार भइनी , सबका खतिरा कुछ न कुछ उपहार खरीदनी आ पैदल ही चल दिहनी।

इहवा तकले तऽ सबकुछू सहिये रहे मेन महजड़ा तऽ अब फंसल। जवने गांव में हमार बियाह भइल बा ओहि गांव में बिआहे से पहिले भा बाद में हम एको हाली ना गइल रहीं। जब बरियात पहुंचल रहे ओहि गांव में, तऽ रात हो गइल रहे जवने कारन हमरा दिशा भरम हो गइल रहे। अब तीन बरीस बितले के बाद हमरा राह तकले इयाद ना रहे।

ओहि भरल दुपहरिया में एगो मनई ना लउकाईल कि हम ओकरा से सही राह पुछ के आगे बढ़ी। तीन बेर गलत राह वरण कइले के बाद कही जाके एकगो बुढ़ऊ बाबा मिललन, जिनका से राह पुछि के जइसे – तइसे हम ई बारे कि. मी. के राह, मात्र; (तनिका ध्यान दीं लोग) मात्र पांच घंटा में पूरा कइके ससुरारी गांव के गोयड़ा पहुंचनी। हद तऽ तब हो गइल, जब गांव के गोयड़ा खेत जोतवावत डरेरी पऽ ससुर जी मिलनी। हम स-सम्मान जाके उहां के गोड़ लगनी, शायद येहि आशा में, कि इहां से ससुर जी घर तकले लिवा लेचलब। पऽ——

इहवा भी डूबत के तिनका के सहारा ना भेटाइल । उहां के हाल-चाल पुछि के, जवन बात कहनी ऊ सुनि के एके गो मुहावरा इयाद आइल। एक गिरनी छतऽ से ऊपर से बाजल मुङ्गड़ी।

उहां के कहनी — बाबू चलीं दुअरवे पऽ, मिथलेश बाड़न (मिथलेश हमरा बड़ऽ सार के नाम हऽ)

ई बात सुनि के हमरा समझ ना आइल, कि हम उहां के आतिथ्य के सम्मान करीं कि कोसीं। हम ससुर जी से के लेखा कहीं, कि बाबुजी जब हम रहिये भुला गइल बानी तऽ दुआर पऽ पहुंचब के लेखा। करीं तऽ करी का कुछो कह ना सकली। बस उहां के आतिथ्य के कोसत गांवों में ढूकि गइनी।
बरियात के समय गउवां उत्तरे – दखिने लागल रहे, आज पूरुबे – पछिमें लागत रहे। बड़ा असमंजस के स्थिति रहे, कठिन मशक्कत के बाद ससुर जी के ऊ तथाकथित घर हमारा भेटाइल, उहो घर पहिचान ये लिए भइल कि हम अपनि मेहर बदे बड़ा हृदय से एगो साड़ी बनारस से खरीद के लियाइल रहीं, उहें साड़ी सुखावे बदे दुआरें पसारल रहे।

आखिरकार भोर के भुलाइल साझु ले ससुरारी पहुंचिये गइल।‌

✍️ पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’
मुसमरवा (मंशानगर)
पश्चिमी चम्पारण, बिहार

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