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10 Aug 2020 · 1 min read

दूर करो माँ सघन अंधेरा

दूर करो माँ सघन अंधेरा,
जाने आया किस काल द्वार से,
महाप्रलय, अट्टहास- अहंकार से,
विध्वंस नृत्य किया घनघोर,
क्रंदन, विलाप करता नित फेरा,
दूर करो माँ सघन अंधेरा ।

विलख रही है सूखी हड्डी,
निस्तेज हुई काया की मिट्टी,
धधक रही विनाश की भट्टी,
विकराल रोग धरती का उर उकेरा,
दूर करो माँ सघन अंधेरा ।

गिद्ध श्रृंगाल उत्सव को आतुर,
रुधिर, मांस, चर्म भक्षण को व्याकुल,
विकट रात्रि का मुख है खादुर,
मृत्यु का यहाँ-वहाँ रैन-बसेरा,
दूर करो माँ सघन अंधेरा ।

है गगन अब शब्द मलीन,
धरा भी असहाय नेह विहीन,
प्रकृति के अवयव हो गए दिशाहीन,
है ईश्वर भी किस हेतु मुख फेरा,
दूर करो माँ सघन अंधेरा ।

तू काली है हृदय विशाली,
तू चामुंडा, शोणित पीने वाली,
तू रक्षिका, बन विकराली
है संबल अब बस तेरा,
दूर करो माँ सघन अंधेरा ।

???? उमा झा

Language: Hindi
16 Likes · 12 Comments · 279 Views
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