आब भेटल विदाई(कविता)

इ जिनगी आब नै दिअ प्रभू
भ्रमवश रहै जीबैके ललक
कोन अप्पन कोन पराया
केहन तो रीत बनेलौं
आह हमे आब भेटल विदाई
हम चलब हम चलब,आब नहि आयब

लऽ लिअ भोजनक थारी
आब नै हम किछ खाएब
फुल फल आओर गृह पर
अधिकारी नहि जमाएब
गंगा जल मे हमे बहा दू
धूप अगरवती मत जलाउ
धन केर अप्पन जानलौ
आब धन केर मत लुटाउ
आह हमे आब भेटल विदाई
हम चलब हम चलब,आब नहि आयब

हम तोरा देलौं की
तोरा लेल केलौ की
तोहि इ सब बनेलौं
नीरस जीनगी रहल तोहर
आब जिनगी मे सब रंग भरू
आब सिसक सिसक कानै छी किया
खुन केर आंसू कनाबै छेलौं
तकिया तोहर भीजल होयत
जखन जखन हिअपे चाकू
अप्पन बोलीस चलाबै छेलौं
आय अपने किया कानै रहल छी
लिअ हमर आशीष लिअ
जुग जुग जियु नाम करू
बौआ मे अप्पन माटि केर
भाषा आओर संस्कार भरू
तोहर जेना नै तोरा कनाएत
आह हमे आब भेटल विदाई
हम चलब हम चलब,आब नहि आयब

मौलिक एवं स्वरचित
© श्रीहर्ष आचार्य

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