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13 May 2023 · 7 min read

🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️नोट : दिनांक 5 अप्रैल 2023 से चल रहे रामचरि

🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️नोट : दिनांक 5 अप्रैल 2023 से चल रहे रामचरितमानस पाठ का समापन दिनांक 15 मई 2023 सोमवार को होगा। कार्यक्रम की अवधि पूर्ववत प्रातः 10:00 बजे से 11:00 बजे तक रहेगी। कृपया पधारने का कष्ट करें।
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संपूर्ण रामचरितमानस का पाठ : दैनिक समीक्षा
आज दिनांक 13 मई 2023 शनिवार प्रातः 10:00 से 11:00 तक उत्तरकांड दोहा संख्या 92 से दोहा संख्या 116 तक का पाठ हुआ ।
पाठ में रामपुर आर्य समाज (पट्टी टोला, निकट मिस्टन गंज) के प्रमुख स्तंभ अवकाश प्राप्त इंजीनियर श्री कौशल्या नंदन, सत्संग प्रेमी श्रीमती शशि गुप्ता, श्री विवेक गुप्ता तथा श्रीमती मंजुल रानी की विशेष सहभागिता रही।

कथा-सार : कागभुशुंडि जी द्वारा कौवे का शरीर प्राप्त करने का कारण-वर्णन

कथा-क्रम : रामचरितमानस में कागभुशुंडी जी तथा गरुड़ जी का संवाद अत्यंत पवित्र है। कागभुशुंडी जी से रामकथा सुनकर गरुड़ जी का मोह तो समाप्त हो गया, लेकिन कुछ प्रश्न उनके मन में शेष रहे। वह पूछने लगे कि किस कारण से आपको कौवे का रूप प्राप्त हुआ ?
कागभुशुंडी जी ने गरुड़ जी को बताया कि बहुत पहले वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जन्मे थे, जो भगवान शंकर का तो भक्त था; लेकिन दूसरे देवताओं की निंदा करने वाला था । काग भुसुंडि जी के गुरु विद्वान थे। सरल हृदय और दयालु थे। लेकिन कागभुसुंडि जी के भीतर अभिमान भरा हुआ था।

एक बार हुआ यह कि जब मंदिर में शिव जी के नाम का पाठ हो रहा था, गुरुजी आए । काग भुसुंडि जी ने अभिमान से ग्रस्त होकर उन्हें नमस्कार तक नहीं किया। गुरु जी ने तो शिष्य के इस आचरण की उपेक्षा कर दी, लेकिन भगवान शंकर ने गुरु के अपमान को सहन नहीं किया। भगवान शंकर ने कहा :-
जे सठ गुरु सन ईर्ष्या करहीं। रौरव नरक कोटि युग परहीं।। (उत्तरकांड चौपाई संख्या 106)
अर्थात जो व्यक्ति गुरु के प्रति ईर्ष्या और अभिमान से ग्रस्त होते हैं, उन्हें भयंकर नर्क भोगना पड़ता है। इसी के साथ भगवान शंकर ने कागभुशुंडी जी को मनुष्य के स्थान पर सर्प हो जाने का शाप दे दिया।

गुरुजी दयालु थे। शिष्य की दुर्दशा से विचलित हो उठे। उन्होंने भगवान शंकर से प्रार्थना की। यह प्रार्थना रुद्राष्टक के रूप में तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखी है:-
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।………
दोहा संख्या 107 के इस रुद्राष्टक से काकभुशुंडि जी के गुरु ने उन शिव को नमस्कार किया है, जो सर्वव्यापक और ब्रह्म-रूप हैं। आकाश स्वरूप हैं। आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करते हैं। निराकार हैं। महाकाल के भी काल हैं । इंद्रियों से परे हैं। अजन्मे हैं । अखंड हैं । प्रलय इनके ही द्वारा होती है। यह शिव साकार रूप में भी दर्शन देते हैं। इसलिए इन्हें गोरे रंग का, सुंदर और विशाल नेत्रों वाला, सिंह का चर्म धारण किए हुए तथा मुंडमाला पहने हुए बताया है। सिर पर गंगा को धारण करने वाले, ललाट पर द्वितीय का चंद्रमा, गले में सांप जिनके हैं, कानों में कुंडल हिलते हुए हैं -यह भी यही शिव हैं।
यह शिव निराकार भी हैं और साकार भी हैं । यह शिव सबके हृदय में निवास करते हैं। कागभुशुंडी जी के गुरुदेव ने शिव से कहा कि मुझे पूजा और योग नहीं आता लेकिन मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्ते करता हूं। आप मुझ पर कृपा कीजिए।

रूद्राष्टक का पाठ फलदायक सिद्ध हुआ । भगवान शंकर ने कहा कि मेरा श्राप तो व्यर्थ नहीं होगा । हजार बार यह जन्म-मरण के चक्र में उलझेगा लेकिन हां इसे जन्म और मृत्यु के कष्ट नहीं छू पाएंगे। दूसरी बात यह भी रहेगी कि सभी योनियों में इसका पिछला ज्ञान समाप्त नहीं होगा । परिणाम यह हुआ कि काग भुसुंडि जी ने सर्प के शरीर को कुछ समय तक रखने के बाद वह शरीर त्याग दिया लेकिन उन्हें कष्ट नहीं हुआ । बार-बार वह जिस योनि में भी जन्म लेते थे, उनका ज्ञान कभी समाप्त नहीं हुआ।

इतना सब होते हुए भी एक बार फिर काग भुसुंडि जी धोखा खा गए । सुमेरु पर्वत के शिखर पर वट वृक्ष की छाया में लोमश मुनि आसीन थे। मनुष्य रूप धारी काग भुसुंडि जी ने लोमश मुनि से सगुण भक्ति-आराधना के बारे में जानकारी चाही। लोमश मुनि ने उन्हें निर्गुण-निराकार ब्रह्म का उपदेश दिया । उसके बारे में बताया :-
मन गोतीत अमल अविनाशी। निर्विकार निरवधि सुख राशी।। सो तें ताहि तोहि नहि भेदा। बारि बीचि इव गावहिं वेदा।। (उत्तरकांड चौपाई संख्या 110)
उपरोक्त चौपाई का अर्थ हनुमान प्रसाद पोद्दार जी इस प्रकार बताते हैं :-“वह मन और इंद्रियों से परे, निर्मल, अविनाशी, निर्विकार, सीमा रहित और सुख राशि है । वेद गाते हैं कि वही तू है। जल और जल की लहर की भांति उसमें और तुझ में कोई भेद नहीं है ।”
निर्गुण-निराकार ब्रह्म की यह व्याख्या यद्यपि व्यक्ति को ब्रह्ममय स्थिति में ले जाने के लिए ध्यान मार्ग से प्रेरित करने वाली होती है ,लेकिन सगुण साकार रूप में भगवान राम की उपासना के इच्छुक कागभुसुंडि जी को यह व्याख्या पसंद नहीं आई। उन्होंने बार-बार अपने गुरु से विरोध प्रकट किया। एक प्रकार से कहिए तो उनका अपमान कर दिया। काल मानो काग भुशिंडी जी के सिर पर चढ़कर बोल रहा था। परिणाम यह हुआ कि काकभुशुंडि जी के गुरु ने उन्हें श्राप दे दिया कि जा तू कौवा बन जा । कागभुशुंडी जी उसी क्षण मनुष्य के स्थान पर कौवा बन गए।

वास्तव में तो यह निर्गुण और निराकार का भेद कहने भर का ही था। इसमें कोई बैर या अपमान वाली बात मूलतः नहीं थी । जो व्यक्ति संपूर्ण जगत को राममय देखता है ,जिसके भीतर काम मद और क्रोध नहीं है, वह वास्तव में देखा जाए तो निर्गुण निराकार का ही सगुण मार्ग से उपासक है ।
अंततः कागभुशुंडी जी के गुरु लोमश ऋषि अपने शिष्य से प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने शिष्य को भगवान राम के बालरूप का ध्यान करने का मार्ग बताया । लोमश ऋषि ने रामचरित्र का भी सुंदर वर्णन कौवे का शरीर धारण कर चुके कागभुशुंडी जी को सुनाया और आशीर्वाद दिया कि तुम्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त होगा। तुम ज्ञान और वैराग्य के भंडार बनोगे। जहां रहोगे, वहां एक योजन तक अविद्या और माया मोह नहीं फटकेंगे।

लोमश ऋषि से आशीर्वाद प्राप्त करके कौवे के रूप में कागभुशुंडी जी नील पर्वत पर रहने लगे। भगवान राम की कथा गाते थे । हंस और अन्य पक्षी उसे सुनते थे। कौवे की देह पाकर ही रामकथा के मर्म को कागभुशुंडि जी ने लोमश ऋषि से प्राप्त किया था। अतः यह कौवे की देह उन्हें इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इसे छोड़ने की कभी नहीं सोची।

पक्षीराज गरुड़ और कौवे की देह धारण किए हुए काग भुशुंडि जी के मध्य जो संवाद नील पर्वत पर हुआ, वह संसार का सर्वश्रेष्ठ सत्संग बन गया। उसमें अमृत की बूंदों के समान अमूल्य रस प्रतिक्षण छलकता रहा। काग भुशुंडि जी ने गरुड़ जी को बताया:-
ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशी।। (उत्तरकांड चौपाई संख्या 116)
अर्थात जीव ईश्वर का अंश है अर्थात चेतन, मल-रहित और सहज ही सुख का भंडार है ।
कागभुशुंडी जी ने कलयुग का भी वर्णन किया है । संवाद के मध्य वह गरुड़ जी को बताते हैं :-
ब्रह्म ज्ञान बिनु नारि नर, कहहिं न दूसरि बात।। कौड़ी लागि लोभवश, करहिं विप्र गुरु घात।। (उत्तरकांड दोहा संख्या 99)
अर्थात लोग कलयुग में ब्रह्म-ज्ञान की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन असलियत यह है कि वह थोड़े से लोभ में ही विद्वानों और गुरुजनों की हत्या तक कर डालते हैं।
कलयुग में विप्र कहे जाने वाले लोग कैसे होते हैं, इस बारे में काग भुशुंडि जी बताते हैं :-
विप्र निरक्षर लोलुप कामी (उत्तरकांड चौपाई संख्या 99)
अर्थात जो कलियुगी विप्र कहलाए जाते हैं; वह निरक्षर, धनलोलुप और कामुकता से भरे हुए होते हैं।
एक और विकृति की ओर कागभुशुंडी जी संकेत करते हैं:-
तपसी धनवंत, दरिद्र गृही (उत्तरकांड छंद संख्या 100) अर्थात तपस्वी धनवान हो जाते हैं और गृहस्थ दरिद्र होते हैं। तात्पर्य यह है कि तपस्वी केवल कहने भर के लिए तपस्वी होते हैं। वास्तव में तो वह धन-संपत्ति और विलासिता के दास बन जाते हैं।
घर-गृहस्थी और परिवार में कलयुग का प्रवेश किस प्रकार हो जाता है, इसका एक चित्र कागंभुशुंडि जी के माध्यम से तुलसीदास जी ने इस चौपाई के द्वारा व्यक्त किया है:-
ससुरारि पियारि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें।। (उत्तरकांड चौपाई संख्या 100)
अर्थात हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के शब्दों में :-“जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुंबी शत्रु-रूप हो गए।”

नीति की एक बड़ी अच्छी बात काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी को बताई थी :-
खल सन कलह न भल नहिं प्रीति।। (उत्तरकांड चौपाई संख्या 105)
अर्थात खल अर्थात दुष्ट के साथ न कलह अच्छी होती है और न प्रीति अच्छी होती है । उसके साथ तो निकटता ही बुरी होती है। अतः उस से उदासीन रहना चाहिए।

जीवन को कल्याणप्रद बनाने वाले सदुपदेशों से भरे कागभुशुंडी जी तथा गरुड़ जी के संवाद को सुनकर भला किस की बुद्धि पवित्र नहीं हो जाएगी। जीवन में विनयशीलता का आश्रय लेते हुए ईश्वर को सर्वव्यापी तथा सबके हृदय में निवास करने वाला मानते हुए हम रुद्राष्टक के मूल भाव को ग्रहण करते हुए सब के प्रति प्रेम और स्नेह को अपना स्वभाव बना लें। अभिमान की छाया भी हमारे पास न फटके -इसी में कागभुशुंडी जी और गरुड़ जी के अनुपम संवाद का महात्म्य निहित है।
—————————————-
समीक्षक : रवि प्रकाश (प्रबंधक)
राजकली देवी शैक्षिक पुस्तकालय (टैगोर स्कूल), पीपल टोला, निकट मिस्टन गंज, रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 99976 15451

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