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9 Feb 2024 · 1 min read

🌹ढ़ूढ़ती हूँ अक्सर🌹

🌹ढ़ूढ़ती हूँ अक्सर 🌹

मैं खुद को ढ़ूढ़ती हूँ आजकल…
मैं कौन हूँ, भूल जाया करती हूँ अक्सर।
कभी हंसती थी, गुनगुनाती थी हरपल…
जीती थी अपनी ही मस्ती में अक्सर।
अब सिसकती हूँ, रो भी लेती हूँ…
आंखों को खबर तक नहीं होने देती हूँ अक्सर।
कभी दौड़ती थी मस्त हवा सी मैं, ऐ
अब संभलकर चलती हूं तो भी ….
ठोकर खा जाती हूँ अक्सर।
हर वक़्त खिलखिलाती थी कभी..
अब मुस्कुराती भी हूँ तो सोच कर अक्सर।
कभी अजनबी को भी अपना बना लेती थी”मधु”…
अब अपनों से भी सोच कर हाथ मिलाती हूँ अक्सर।
श्वेता सूद ‘मधु’
लुधियाना (पंजाब)

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