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27 Jan 2024 · 1 min read

सिलसिला

, सिलसिला

बात मैं करता गया ,औ
सिल-सिला बढ़ता गया –
प्रीत का वह गीत था या ,
हृदय कुछ गुनता गया !

पास ही हो तुम हमारे ,
भास ये होता गया-
जो कि कल तक ना खिला,
वो सहज खिलता गया !

माधुरी धुन गूँज कर के ,
कान में कुछ कह गयी –
मन हुआ ना काम ऐसे ;
वक्त कम होता गया !

यूँ तो चादर तान दी है,
धुंध ने आकाश में –
पर तुम्हारा सदृश चेहरा,
जेह्न में दिखता गया !

वासना को है जगह कब,
हृदय की इस कोर में –
कामनाओं का पहर जब ,
भाव पर चढ़ता गया !

क्या जरूरत है हमें ये ,
दर्श दर्पण में करें –
आरसी तेरी आँख की में,
अक्स यूँ दिखता गया !

हाथ मेरे हाथ में जब,
साथ में आ जाय तो –
यूँ लगे संतोष का घर ,
चाँद पर बनता गया !

बंदिशों की भीड़ में तो ,
जिंदगी जीते सभी-
बंदिशों में भी साथ दो तो,
जन्म ये सकुशल गया !

उड़ रहे इन पंछियों ने ,
बात की है ये उभय –
चलो बता दें प्रेम कभी भी ,
दिल से किया न व्यर्थ गया !
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
C/R स्वरूप दिनकर, आगरा
———————————–

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