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Apr 29, 2022 · 8 min read

*सादा जीवन उच्च विचार के धनी कविवर रूप किशोर गुप्ता जी*

*सादा जीवन उच्च विचार के धनी कविवर रूप किशोर गुप्ता जी*
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मुरादाबाद मंडल की *तहसील बहजोई* (जिला संभल) निवासी श्री रूप किशोर गुप्ता जी से भेंट का अवसर 28 अप्रैल 2022 को आया । आपकी आकाशवाणी रामपुर में एकल-काव्यपाठ की रिकॉर्डिंग थी। अंतः प्रेरणा से आप मेरी दुकान पर पधारे । सरल व्यक्तित्व के स्वामी 79 वर्ष की आयु ( जन्म तिथि 25 अप्रैल 1943 ) में भी चलने-फिरने-बोलने और स्मरण शक्ति की दृष्टि से एकदम सजग। गोरा-चिट्टा रंग, बड़ी-बड़ी सफेद मूछें ,आँखों पर चश्मा चढ़ा हुआ था ।
कहने लगे “चिंताओं से मुक्त रहकर जीवन जीता हूँ। न डायबिटीज है, न हार्ट की कोई बीमारी है । एक पैसे की दवाई खाने की मजबूरी नहीं रहती । ”
चिंता मुक्त रहने का राज भी आपने बता दिया : “मैं घर-परिवार में किसी के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करता । सब स्वतंत्र हैं । अपने विचार के अनुसार अच्छे ढंग से जीवन व्यतीत कर रहे हैं । दो बेटों की बिजली की दुकानें हैं । चंद्रपाल इंटर कॉलेज बहजोई से हिंदी प्रवक्ता के पद से सेवानिवृत्त हुआ हूँ। पेंशन मिल रही है ,आत्मनिर्भर हूँ।”
बातचीत की दिशा अनायास गीता की ओर मुड़ गई । बस फिर क्या था ! रूप किशोर जी ज्ञान-भक्ति और कर्म का मर्म सीधी सरल भाषा में समझाने लग गए । कहने लगे :-“आप यूँ समझ लीजिए कि एक बच्चा स्कूल से घर आ रहा है । बहुत जोरों की भूख उसे लगी है । सोचता है ,जल्दी से जल्दी बस्ता पटकूँ और कुछ खाना खा लूँ। लेकिन घर आते ही क्या देखता है कि एक अतिथि बैठे हुए हैं और उसकी माँ बताती हैं कि बेटा यह तुम्हारे मामा जी हैं । सुनते ही बच्चे को आपसी संबंधों का बोध होता है । इसे _ज्ञान योग_ कहते हैं । तत्पश्चात बच्चा मामा जी के चरण स्पर्श करता है । रूप किशोर गुप्ता जी इस क्रिया को _कर्म योग_ की संज्ञा देते हैं और तत्पश्चात बच्चा मामा जी की आवभगत में लग जाता है तथा अपनी भूख-प्यास भूल जाता है । यह _भक्ति योग_ है । चीजों को बड़ी सरलता के साथ व्यावहारिक रूप में आपने समझा है और इसीलिए समझा पा रहे हैं ।
एक अध्यापक के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए आपने बताया कि “मेरी कार्यप्रणाली कठिन से कठिन प्रश्न को भी इतनी सरलता से विद्यार्थियों के सामने सुलझा कर प्रस्तुत करने की रही कि शायद ही कोई विद्यार्थी ऐसा हो जिसे मेरे द्वारा पढ़ाया गया पाठ समझ में न आया हो।”
एक अन्य अनुभव साझा करते हुए आपने बताया कि कई बार जब मैं कुछ भारी गुत्थी को सुलझाने के लिए प्रयत्नशील होता है और देर तक भी न सुलझा पाता हूँ तब फिर मैं संघर्ष करना बंद कर देता हूँ। निढ़ाल होकर शांत अवस्था में आ जाता हूँ और तब आश्चर्यजनक रूप से सहजता से ही वह गुत्थी सुलझ जाती है । इसके पीछे का कारण यह है कि जब तक हमारा मन तनाव और आवेश से ग्रस्त रहता है ,वह सही दिशा में ठीक-ठीक आगे नहीं बढ़ पाता । शांत मन चीजों का समाधान खोजता है और सफलता की गारंटी एक व्यक्ति का शांत मन ही कहा जाना चाहिए ।
बात विद्वानों के प्रवचनों पर चलने लगी । रूप किशोर जी ने इस बिंदु पर भी बहुत व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रकट किया। आपका कहना था कि समाज में प्रभाव और परिवर्तन वक्ता के भाषण और शैली से नहीं पड़ता । वह तो वक्ता के वक्तव्य से हटकर उसके निजी जीवन और आचरण के द्वारा ही पड़ सकता है । कहें कुछ तथा करें कुछ – इस प्रकार की दोहरी जीवन शैली अपनाने वाले लोग समाज का मार्गदर्शन नहीं कर सकते । जब श्रोता यह जानता है कि वक्ता अपने हृदय से बोल रहा है तथा उसके कथन के पीछे उसकी तपस्या छिपी हुई है तब वक्ता के भाषण का जादू जैसा असर होता है। इसलिए गुरु वही होता है जो प्रैक्टिकल रूप से शिष्य को जीवन के पथ पर सत्य का दर्शन करा सके। इस दृष्टि से रूप किशोर गुप्ता जी ने स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का नाम लिया ।
आपने बताया कि जब स्वामी विवेकानंद का नाम नरेंद्र था ,तब उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस हुआ करते थे । नवयुवक नरेंद्र ने एक दिन रामकृष्ण परमहंस से पूछा “क्या सचमुच ईश्वर होता है ? क्या आपने उसे देखा है ? ”
रामकृष्ण परमहंस ने मुस्कुराते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ नरेंद्र को जवाब दिया “हाँ ! ईश्वर होता है । मैंने उसे देखा है । ठीक वैसे ही जैसे तुम मुझे देख रहे हो और मैं तुम्हें देख रहा हूँ।”
नरेंद्र आश्चर्यचकित रह गए ! “क्या मैं देख सकता हूँ ?”
” क्यों नहीं ? “-रामकृष्ण परमहंस ने कहा और फिर उन्होंने नवयुवक नरेंद्र के सिर पर अपना हाथ रख दिया । हाथ रखना था कि नरेंद्र को अपना संपर्क इस संसार से कटा हुआ प्रतीत होने लगा । वह समाधिस्थ हो गए । कुछ बोध न रहा । यह ईश्वर को प्रत्यक्ष रूप से देखना और जानना था । इसके बाद ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें कोई अर्थ नहीं रखतीं। पुस्तकों को पढ़ने और रटने से ज्ञान नहीं मिलता ,वह तो प्रत्यक्ष अनुभव करने से ही प्राप्त होता है ।
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*श्री रूप किशोर गुप्ता के काव्य संग्रह “कतरे में समंदर है” की समीक्षा*
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रूप किशोर जी ने अपनी एक पुस्तक काव्य-संग्रह *कतरे में समंदर है* भी भेंट की । यह संस्कार भारती ,बहजोई (जिला संभल) द्वारा प्रकाशित है । पुस्तक निशुल्क वितरण हेतु प्रकाशित की गई है। प्रथम संस्करण 2018 का है । एक सौ प्रष्ठों की इस पुस्तक में रूप किशोर जी के गीत, गजल, मुक्तक और दोहे प्रकाशित हुए हैं। जहाँ एक ओर अध्यात्म का स्वर पुस्तक में मुख्य चेतना के साथ प्रकट होता है ,वहीं दूसरी ओर देशभक्ति का भाव उन्हें अत्यधिक प्रिय है । सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए प्रश्नों पर भी आपकी पैनी लेखनी चली है । जिस तरह से आप जीवन में व्यावहारिक सोच रखते हैं ,ठीक उसी प्रकार से आपके लेखन में भी समाज-जीवन को गहराई से परखते हुए उसके मर्म को समझ पाने की सामर्थ्य नजर आती है।
सामाजिक संदर्भों में आपके यह *दोहे* ध्यान देने योग्य हैं:-

*कभी-कभी ही जाइए ,सज-धज बन मेहमान*
*रिश्तेदारी में तभी ,होता है सम्मान*

अर्थात रिश्तेदारी में कम जाने से ही सम्मान मिल पाता है।
एक अन्य दोहे में नोटबंदी के साहसिक निर्णय की प्रशंसा करते हुए आप लिखते हैं:-

*भ्रष्टाचारी कह रहे ,बिगड़ा सारा खेल*
*मोदी तुमने डाल दी ,सब की नाक नकेल*
( प्रष्ठ 48 )

आपके *मुक्तक* कुछ ऐसे हैं ,जिन्हें गुनगुनाने को भी जी चाहता है और अगर आवश्यकता पड़ जाए तो भीड़ में सुनाने से महफिल में वातावरण बन जाएगा । ऐसा ही आपका एक मुक्तक शरीर की नश्वरता के संबंध में अत्यंत भावप्रवण है । देखिए:-

*इस हाड़-मांस के पुतले पर ,कुछ रोज जवानी रहती है*
*इस प्यार के दरिया में भैया ,कुछ रोज रवानी रहती है*
*फिर यौवन ढलता जाता है ,काया जर्जर हो जाती है*
*फिर दुनिया से उठ जाता है ,कुछ रोज कहानी रहती है*
( प्रष्ठ 89 )

शरीर की नश्वरता पर दृष्टिपात न करने के कारण ही आज भौतिकता के चरमोत्कर्ष का स्पर्श करने के बाद भी व्यक्ति के जीवन में कुछ अतृप्त-भाव बना रहता है । कवि रूप किशोर गुप्ता ने इसी ओर एक मुक्तक के द्वारा मनोभावों को अभिव्यक्त किया है :-

*हर तरफ काँटे ही काँटे ,छाँव को बरगद नहीं है*
*हर तरफ ही गंदगी है ,मुक्त कोई नद नहीं है*
*जिस तरफ देखा उधर है भय निराशा और कुंठा*
*सुख का सब सामान तो है ,पर हृदय गदगद नहीं है*
( प्रष्ठ 77 )

देशभक्ति का भाव रूप किशोर गुप्ता जी के काव्य का मुख्य स्वर रहा है। उसमें भी क्रांतिकारियों तथा प्राण न्योछावर करने वाले वीरों के प्रति उनकी लेखनी नतमस्तक होकर आदि से अंत तक प्रवाहमान रही है । क्रांतिवीरों को भारत की स्वतंत्रता का श्रेय देते हुए आपका एक मुक्तक स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में और भी समीचीन हो उठा है :-

*अनगिनत जाने गई थीं जब यह आजादी मिली*
*सैकड़ों फाँसी लगी थीं जब यह आजादी मिली*
*जंगे-आजादी लड़े थे बाँधकर सिर से कफन*
*हर तरफ लाशें बिछी थीं जब यह आजादी मिली*
( प्रष्ठ 70 )

जिसके हृदय में संतोष नहीं है वहाँ शांति नहीं हो सकती । सुख के साधन एक अलग विषय है ,जीवन में सुख की अनुभूति एक दूसरा ही विषय है । कवि रूप किशोर गुप्ता जी ने समाज को निकट से देखा है। उन्होंने अनुभव किया है कि धनवालों के पास अथाह धन होते हुए भी वह दुखी हैं जबकि दूसरी ओर आम आदमी ज्यादा बेहतर तरीके से अपने भीतर सुख और शांति का अनुभव करते हुए जीवन बिता देता है। इसी बात को एक मुक्तक में कितनी सादगी के साथ आप ने व्यक्त किया है :-

*हमने फुटपाथों पे देखे ,चैन से सोते हुए*
*और देखे कोठियों में ,हादसे होते हुए*
*हमने काटी मुफलिसी में ,जिंदगी हँसते हुए*
*और धनवालों को देखा ,हर घड़ी रोते हुए*
( प्रष्ठ 63 )

पुस्तक के प्रारंभिक अंश उन गीतों से भरे हुए हैं जो वृक्ष ,जल और वायुमंडल की पवित्रता की आकांक्षाओं पर आधारित हैं। एक गीत में वह नदी की स्वच्छता को पुनर्स्थापित करने की अपनी मंगलमय आकांक्षा प्रकट करते हैं । आपकी भावनाएँ निम्नलिखित पंक्तियों में प्रकट हुई हैं :-

*मैं हूँ प्यासी नदी कोई तो ,मेरी प्यास बुझा दो*
*मुझसे रूठ गई जो मेरी निर्मल धारा ला दो*
( प्रष्ठ 30 )

अतुकांत कविता एक प्रमुख विधा के रूप में स्थापित हो चली है । सभी ने इस विधा में कुछ न कुछ अवश्य लिखा है। रूप किशोर गुप्ता जी छोटी सी कविता के रूप में लिखते हैं :-

*जो नीचे है ऊपर होना चाहता है*
*जो ऊपर है आकाश छूना चाहता है*
*सभी पंछी उड़े जा रहे हैं आकाश छूने को*
*बढ़े जा रहे हैं उड़ते ही रहेंगे बढ़ते ही रहेंगे*
*सूरज को छूने तक ,पंखों के झुलसने तक*
(प्रष्ठ 20 )

आपकी कई गजलें प्रस्तुत काव्य संग्रह में संग्रहित हैं । जहाँ एक ओर आपके गीत अरबी-फारसी की शब्दावली से प्रायः मुक्त हैं ,वहीं दूसरी ओर गजलों पर अरबी-फारसी के शब्दों का खूब रंग चढ़ा हुआ है। इससे जहाँ एक ओर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आपकी बोलचाल की भाषा पर उर्दू का काफी प्रभाव है, वहीं दूसरी ओर यह कहना भी अनुचित न होगा कि गजल लिखते समय रचनाकार उर्दू के शब्दों का अधिक प्रयोग करते हैं ।
इस तथ्य की पुष्टि आप की गजलें तथा काव्य की दूसरी विधाओं के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो रही है । कुछ गजलों के कुछ शेर इस प्रकार हैं :-

*देखे हजार रंग के ,जलवे निगाह ने*
*पर लाजवाब दोस्तों ,वो हुस्न ए यार है*
( प्रष्ठ 49 )

एक अन्य ग़ज़ल का शेर है :-

*ऐ शेख तेरी मस्जिद ,तुझको रहे मुबारक*
*जो मेरा मयकदा है ,क्या उसका घर नहीं है*
( प्रष्ठ 50 )
सर्वधर्म समभाव को प्रदर्शित करती गजल का उपरोक्त शेर इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि परमात्मा सर्वत्र है और उसे किसी विशिष्ट चहारदीवारी में बाँधा नहीं जा सकता।
गजल शीर्षक से एक रचना की ओर हमारा ध्यान गया। इसमें अरबी-फारसी पूरी तरह से नदारद है । आप भी कथ्य और शिल्प के बेहतरीन प्रस्तुतीकरण का आनंद उठाइए । इसे गजल न कह कर *गीतिका* कहना अधिक उपयुक्त होगा :-

*जितने भी वैरागी देखे*
*सब धन के अनुरागी देखे*

*जिनको चाह नहीं है कोई*
*ऐसे कम बड़भागी देखे*

*जिनके तन को उजला देखा*
*उनके ही मन दागी देखे*

*जिन को नहीं मिली रेवड़ियाँ*
*वे ही होते बागी देखे*

( प्रष्ठ 52 – 53 )
गीतिका की उपरोक्त पंक्तियाँ एक फकीर की आवाज कही जा सकती हैं। इसमें न लोभ है, न भय है। केवल सत्य की गूँज है।
कुल मिलाकर रूप किशोर गुप्ता जी उन लोगों में से हैं जिन्होंने अपने हृदय के निर्मल भावों को अभिव्यक्त करने के लिए कविता को माध्यम बनाया और यह कहने में कोई संकोच नहीं किया जाना चाहिए कि आपने सशक्तता के साथ काव्य रूप में अपने विचारों और भावों को जनता तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की है । आपका जीवन और आपका विचार दोनों ही सत्य की कसौटी पर अभिनंदनीय है ।
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लेखक : रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा
रामपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 99976 15451

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