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Jan 30, 2022 · 12 min read

सर्वप्रिय श्री अख्तर अली खाँ

*सर्वप्रिय श्री अख्तर अली खाँ*
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सातवें दशक में रामपुर की राजनीति में जो व्यक्ति छाए रहे, उनमें श्री अख्तर अली खाँ का सर्वोपरि स्थान रहा। इस एक दशक के दौर में उन्होंने रामपुर नगर पालिका के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली और फिर उत्तर प्रदेश सरकार में केबिनेट मंत्री के रूप में भी काम किया। दरअसल तत्कालीन रामपुर में जन्मे, पले और बढ़े व्यक्तियों में, जो राजनीति में आए और केबिनेट मंत्री बन सके ,वह एक मात्र श्री अख्तर अली खां ही हैं। श्री अख्तर अली खां को एक राजनीतिज्ञ के नाते जो जन सम्मान मिला ,वह बहुत कम लोगों को ही मिल पाता है। उन्होंने सिर्फ राजनीति नहीं की, उन्होंने तो जनसेवा की और लोक हित की साधना की। वह हमारे समकालीन सार्वजनिक जीवन के एक ऐसे ज्योति पुंज हैं जिन्हें समाज के सभी वर्गों का विश्वास प्राप्त हुआ है और हिन्दू-मुसलमान सभी से आदर-सम्मान हासिल हुआ है । श्री अख्तर अली खां की विनम्रता, सहजता और उदारता हर रामपुर वासी में उनके प्रति श्रद्धा-आस्था जगाती है। ऊंचे पदों को पाने के बावजूद सर्वसाधारण के साथ एकाकार होने-होते रहने की उनकी प्रवृत्ति, उन्हें राजनीति जगत में असाधारण स्थान दिलाती है। यह स्थान जनता के हृदय में है और जनमानस के मन में है। साफ सुथरे सोच के साथ श्री खां राजनीति में प्रविष्ट हुए थे श्रीर अपने सुलभे विचारों के कारण बहुत शीघ्र जनता के लोकप्रिय नेता बन गए। सही नेतृत्व, हिन्दू या मुसलमान नहीं होता। वह तो जनता का होता है, जनता के लिए सोचता है और जनता के लिए काम करता है। श्री अख्तर अली खां ने सही सोच के सच्चे नेतृत्व को बार-बार प्रमाणित किया है। वे स्वतंत्र रूप से सोचते हैं, सोच को तर्क की कसौटी पर कसते हैं और जो सही समझते हैं, उसका दृढता पूर्वक प्रतिपादन करते हैं। राष्ट्रीय विचार धारा के धनी श्री अख्तर अली खां साम्प्रदायिकता पर आधृत राजनीति को पूरे तौर पर नकारते हैं, वोट और धर्म के गठबन्धन को अस्वीकार करते हैं और राष्ट्रीय जीवन में समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हैं। उन्होंने समय समय पर हिन्दी को सही मायने में राष्ट्रभाषा मानने-बनाने के पक्ष में जो विचार रखे हैं, वे बड़े ही प्रेरक हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि श्री अख्तर अली खां का राजनीतिक-व्यक्तिगत जीवन सद्भाव, समन्वय और उदारवाद के मूल्यों से प्रेरित रहा है और इस नाते वह व्यापक धरातल पर जनता का दिल जीतने में सफल भी रहे हैं। आने वाली तीस मार्च को वह छप्पन वर्ष के हो जायेंगे।
एक सम्पन्न जमींदार परिवार में *तीस मार्च सन उन्नीस सौ तीस ईसवी* को जन्मे थे श्री अख्तर अली खाँ। । पिता का नाम श्री मुमताज खां, जो रामपुर रियासत में तहसीलदार का ओहदा सँभाले हुए थे। सामाजिक-राजनीतिक चेतना के लिहाज से तब तक कुछ नहीं जग पाया, श्री अख्तर अली खां में -जब रामपुर में रहे और स्थानीय रजा इन्टर कालेज से उन्होंने इन्टर परीक्षा उत्तीर्ण की। यह लखनऊ था, जहां 1946 में बी० ए० करने के लिए गए और जहां उन्होंने हिन्दुस्तान की राजनीति को नजदीक से देखा, देश की राजनीतिक हस्तियों का साथ पाया, विचारों में कतिपय ‘ऊंचाइयों का माहौल पाया। और इन सबमें सबसे बड़ी बात थी कि एक स्वतंत्र उन्मुक्त परिवेश पाया। 1946 से 1950 तक वह *लखनऊ विश्वविद्यालय में बी० ए० और एल० एल० बी०* पढ़े । यह हिन्दुस्तान का सबसे बेहतर और सबसे बदतर दौर था। इसी में देश ने तबाही, बर्बादी और विभाजन की विभीषिका देखी और इसी दौर ने आजादी देखी, आजाद देश में गणतंत्र का सूरज उगता देखा। कितना विरोधाभास था -इस समूचे दृश्य में ।
युवा अख्तर अली खाँ ने *आचार्य नरेन्द्र देव* जैसे तपस्वी कुलपति का सान्निध्य प्राप्त किया। आचार्य जी की महानता और व्यक्तित्व की ऊंचाई के प्रति उनके मन में आज भी बड़ा ही आदर है। विश्वविद्यालय के अन्य प्रोफेसरों में डा० डी० पी० मुखर्जी और डा० डी० एन० मजूमदार का स्मरण उन्हें आज भी बना हुआ है। यह विश्वविद्यालय का वह दौर था ,जब वहां डा० बीरबल साहनी सदृश वनस्पति विज्ञानी छात्रों को देखने-सुनने को मिलते थे। आचार्य नरेन्द्र देव का वात्सल्य तो श्री अख्तर अली खां को आज भी स्मरण है। एल-एल० बी० में वह बीमार पड़ गए, हाजिरी कम हो गयीं-परीक्षा में बैठने नहीं दिया जा रहा था। वह आचार्य जी मिले। आचार्य जी ने उनकी कठिनाई समझी और परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी । अख्तर साहब प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गये। लखनऊ, तब (और अब भी) उत्तर प्रदेश की राजनीति का गढ़ था। बहुतों को देखने-सुनने का मौका श्री खाँ को मिला। श्री रफी अहमद किदवई तो विश्वविद्यालय अक्सर आते रहते थे। छात्रों के प्रति श्री खां को याद है—उनका व्यवहार बहुत मृदु रहा करता था। विश्व विद्यालय के हबीबुल्ला होस्टल में ही विद्यार्थी श्री कृष्ण चन्द्र पंत रहते थे । वह श्री अख्तर साहब से एक-आध साल जूनियर थे। सभा-जलसे तो होते ही रहते थे—लखनऊ में। संघ के श्री गुरु जी लखनऊ आए, तो श्री खां ने उनको भी सुना। वह कहते हैं -“दूसरों के विचारों को सुनने में मेरी रूचि थी। मैं ज्यादा से ज्यादा जानने-समझने को उत्सुक था।” संभवतः इसी वैचारिक उदारवाद ने श्री खां में कट्टरता का प्रवेश नहीं होने दिया । वह, अच्छाइयाँ-चाहे जहाँ हों-उसका आदर करते थे। लखनऊ विश्व विद्यालय में अध्ययन काल की अनेक स्मृतियां उन्हें आज भी ताजा हैं। दीक्षान्त समारोह में पं० जवाहर लाल नेहरू का आगमन क्या कभी भुलाया जा सकता है ! और सरोजनी नायडू (जो उस समय राज्यपाल थीं) का जवाहर लाल को सम्बोधन भी कौन भूल सकता है ? लखनऊ के हजरतगंज क्षेत्र में स्थित यूनिवर्सल बुक डिपो पर अक्सर सरोजनी नायडू आती रहती थीं । ऊंचे पद पर होने के बावजूद बिल्कुल जन साधारण की तरह। छात्र अख्तर अली खां को–जो स्वयं भी किताबें पढ़ने का शौक रखते थे (और अब भी रखते हैं) इस नाते सरोजनी नायडू का विशेष रूप से स्मरण है। तात्पर्य यह है कि लखनऊ विश्वविद्यालय में श्री अख्तर अली खां का अध्ययन काल, विशाल धरातल पर विचार-जगत से जुड़ने का समय था। भारत की राष्ट्रीय राजनीति की जय प्रकाश नारायण और आचार्य नरेन्द्र देव सदृश तपस्वी विभूतियों को सुनने-जानने का यह एक मौका था । आचार्य नरेन्द्र देव का सान्निध्य तो विशेष महत्व रखता है। आचार्य जी निःस्वार्थ और ईमानदारी की प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक शिष्य के नाते श्री अख्तर अली खां ने अपने गुरू के इन गुणों को ग्रहण किया और जीवन में आत्मसात किया । वे आचार्य जी का, अपने जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा मानते हैं । लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी होने के बाद भी यह जीवन-मूल्य उनके व्यक्तित्व में बराबर बने रहे। रामपुर के सार्वजनिक जीवन में उनका बेदाग चरित्र और अत्यधिक साफ सुथरी छवि, राजनीति में एक मिसाल कही जा सकती है। इसका श्रेय काफी हद तक उनके उदार विचारों, समन्वयवादी नीतियों और निःस्वार्थ सेवा वृत्ति को दिया जा सकता है।
1950 में रामपुर आने पर श्री अख्तर अली खां ने रामपुर की राजनीति को काफी दिलचस्पी से देखा। वह कांग्रेस से प्रभावित थे मगर 1952 के चुनावों में, जब रामपुर संसदीय क्षेत्र से *मौलाना अबुल कलाम आजाद* ने चुनाव लड़ा तो उनके युवा मन में कई प्रश्न पैदा हुए। 1952 के माहौल को वह याद करते हुए कहते हैं, “मौलाना आजाद तब, चाहे जहां से चुनाव लड़ते, वह अवश्य जीतते । वह एक महान शख्सियत थे। मेरी समझ में नहीं आता कि उन्हें मुस्लिम-बहुल रामपुर से ही क्यों लड़ाया गया? मौलाना आजाद जैसे आजादी की लड़ाई के सिपाही की गरिमा इस बात में होती कि वह हिन्दू इलाके से खड़े होते और जीतते । मगर ऐसा नहीं हुआ। गलत बुनियादें शुरू से ही पड़ गयीं।”
मगर तो भी श्री अख्तर अली खां को कांग्रेस से लगाव कम नहीं हुआ। 1960 तक तो वह कांग्रेस पार्टी में बाकायदा काफी काम करने लगे। वह *1962 में कांग्रेस टिकट पर रामपुर नगर पालिका के अध्यक्ष* चुने गये और उन्होंने 1964 तक इस पद पर रहकर रामपुर की शहरी जनता की काफी सेवा की। सड़कों की सफाई, और नालियों की सही व्यवस्था के लिए उन्होंने इन्तजाम कराये। उनके अध्यक्षीय कार्यकाल में कई काम हुए। पहले चुंगी, कीमत के हिसाब से लगती थी। श्री अख्तर अली खां ने नियम बनाए कि आगे से चुंगी, वजन के आधार पर लगा करेगी। इससे मनमर्जी का माहौल खत्म हुआ और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सका । सम्पूर्ण नगर पालिका प्रशासन को चुस्त और सक्षम बनाने-बनाये रखने की ओर उनका ध्यान काफी रहता था। तब, नगर पालिका की शक्ति के अन्तर्गत था कि वह कर्मचारियों को नियुक्त करे। अब, कर्मचारियों को रखना-निकालना राज्य सरकार के अधीन है। लिहाजा श्री खां मानते हैं कि अगर आज नगर पालिकायें सक्षम तौर पर काम नहीं कर पा रही है तो इसका एक बड़ा कारण नगरपालिकाओं के अधिकारों में कमी है। अपने कार्यकाल में श्री खां ने रामपुर में अनेक बेसिक स्कूल खुलवाए और शिक्षा का विस्तार किया। स्थानीय नेहरू कन्या कालेज जो जूनियर हाई स्कूल था -उसे पहले 1962 में हाई स्कूल कराया और फिर 1964 में इन्टरमीडिएट कालेज करने में सफलता पाई। दरअसल *नेहरू कन्या कालेज* में इन्टरमीडिएट कक्षाएँ बगैर शिक्षा बोर्ड की मान्यता मिले ही लगनी शुरू हो गई जिससे-श्री खां को याद है – काफी विवाद और परेशानी पैदा हो गई। तो भी लखनऊ दौड़-धूप करके बहुत जल्द उन्होंने विद्यालय को इन्टर की मान्यता दिलाने में सफलता प्राप्त कर ली ।
कई दूसरे अच्छे काम भी हुए। अध्यक्षीय कार्यकाल में ही उन्होंने *रामपुर आई रिलीफ सोसायटी* (डालमिया नेत्र चिकित्सालय से सम्बद्ध) को वार्षिक पांच हजार रुपये के अनुदान की नगरपालिका फंड से व्यवस्था करवाई। बाद में तो आगे चलकर करीब पांच-छह साल से रामपुर नुमाइश की आमदनी का भी एक बड़ा हिस्सा (करीब दस हजार रुपया) डालमिया नेत्र चिकित्सालय को दिलवाने में वह सफल रहे हैं। *रोटरी क्लब ,रामपुर* द्वारा संचालित चिकित्सालय के लिए जमीन श्री खां की कोशिशों से ही 1962-63 के आसपास लीज पर नगर पालिका ने दी है। श्री खां तब अध्यक्ष थे। इस लीज की शर्त यह है कि जमीन तब तक ही क्लब की रहेगी, जब तक चिकित्सालय चलेगा। रामपुर में खेलों को भी श्री खां के अध्यक्षीय कार्यकाल में काफी प्रोत्साहन मिला। इस दौरान लगातार तीन सालों तक उन्होंने *अखिल भारतीय स्तर के रजा हाकी टूर्नामेंट* रामपुर में आयोजित करने में सफलता पाई। हिन्दी संस्था ज्ञान मंदिर के विकास के लिए भी उन्होंने इसी दौर में काफी काम किया। १९६४ के चीनी आकृमण के मध्य नगर पालिका की ओर से किले में सूचना केन्द्र कायम हुआ और शहर भर में लाउडस्पीकरों पर जनता को अनेक उपयोगी सूचनायें तथा युद्ध सम्बन्धी एहतियातें बताई जाती थीं । कुल मिलाकर, एक सजग नगर पालिका अध्यक्ष की तरह कार्य करते रहे— श्री अख्तर साहब ।
श्री अख्तर अली खां का राजनीतिक जीवन किसी पार्टी-विशेष के अनुशासन से विशेष रूप से बँधा नहीं जान पड़ता । वह चाहे जब भी किसी भी पार्टी में सक्रिय रहे हों मगर आजाद ही रहे हैं। नगर पालिका के अगले चुनावों में उन्हें कांग्रेस पार्टी द्वारा अध्यक्ष पद का उम्मीदवार न बनाए जाने के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी और बाद में आगे चलकर *स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर 1967 में रामपुर शहर से चुनाव* लड़ कर विधानसभा में पहुंचे। जो राजनीति में सक्रिय होते हैं, उनके कतिपय कार्यों पर कुछ विवाद अथवा असहमति हो जाना अस्वाभाविक नहीं समझा जाना चाहिए । तो भी यह निर्विवाद है कि श्री खां की ईमानदारी, नेकनियती और जनता के हित में प्रतिबद्धता शक से हमेशा ऊपर रही। असेम्बली चुनाव में 64 हजार वोटों में से 46 हजार वोटों के मिलने के कुछ तो मायने निकालने ही होंगे ? विधानसभा में श्री अख्तर अली खां का यह प्रथम प्रवेश था। श्री चन्द्र भानु गुप्ता तब कांग्रेस के मुख्य मंत्री थे और अत्यन्त अल्प बहुमत पर सरकार टिकी थी। श्री चरण सिंह द्वारा कांग्रेस
पार्टी छोड़ने के कारण गुप्ता मंत्रिमंडल अल्पमत में आ गया और कांग्रेस सरकार गिर गई। संयुक्त विधायक दल (संविद) सरकार का एक नया युग शुरू हुआ। अपनी योग्यता के कारण श्री खां ने श्री चरण सिंह का ध्यान आकर्षित किया। उन्हें केबिनेट में ले लिया गया और *एक्साइज तथा मुस्लिम वक्फ मंत्रालय* सौंपा गया। एक्साइज विभाग में काम करना कठिन चुनौती थी। शराब की बिक्री से राजस्व की ज्यादा वसूली, जहाँ एक ओर इसका लक्ष्य होता है, वहीं दूसरी ओर शराब की बुराई को मिटाने की जिम्मेदारी भी रहती है। श्री अख्तर अली खाँ ने संतुलन साधा। “पूर्ण नशाबन्दी” व्यवहारिक नहीं हो सकती थी। क्रमिक रूप से धीरे-धीरे कुछ क्षेत्रों में यह लागू की गई। बाकी क्षेत्रों में जमकर” श्री खां याद करते हैं “शराब की बुराई के बारे में लोगों को समझाया गया। हमने पहली बार नशाबन्दी का जन अभियान चलाया था।” मगर स्वतंत्र पार्टी में रहकर श्री खां ज्यादा दिन काम नहीं कर पाये। मुश्किल से 6 महीने भी नहीं बीते होंगे कि उन्होंने स्वतंत्र पार्टी से इस्तीफा दे दिया । स्वतंत्र पार्टी द्वारा इजरायल को समर्थन दिए जाने के निर्णय के विरुद्ध यह इस्तीफा दिया गया था। मगर इस इस्तीफे में भी एक नैतिकता थी- पहले मंत्री की कुर्सी छोड़ी, फिर पार्टी से हटे। मगर श्री चरण सिंह से नजदीकी बनी रही। लिहाजा चार महीने बाद फिर उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में केबिनेट मंत्री बने । मंत्रालय मिला *स्वास्थ्य और मुस्लिम वक्फ* ।
श्री अख्तर अली खाँ बताते हैं कि श्री चरण सिंह को सन्देह था कि एक मुसलमान होने की वजह से क्या वह परिवार नियोजन कार्यक्रम का यथोचित समर्थन कर सकेंगे? यह भी सच है कि मुसलमान परिवार नियोजन के प्रति अनुदार समझे जाते हैं। लिहाजा स्वास्थ्य विभाग सौंपने से पहले श्री चरण सिंह ने परिवार नियोजन के विषय में श्री अख्तर अली खां के विचार जानने चाहे। श्री खां ने साफ साफ कहा कि *परिवार नियोजन एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है और बढ़ती जनसंख्या एक राष्ट्रीय चुनौती है।* हर धर्म, हर वर्ग और हर प्रान्त के लोगों को परिवार नियोजन का पक्षधर होना ही चाहिए। श्री अख्तर अली खां मुस्लिम नेताओं में परिवार नियोजन के संभवतः सर्वाधिक उग्र समर्थक कहे जा सकते हैं। वह इसे देश और समाज की महती आवश्यकता मानते हैं। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने पहली बार परिवार नियोजन कार्यक्रम में जिला प्रशासन को भागीदार बनाया और व्यापक पैमाने पर सीमित-परिवार के संदेश का प्रचार किया। अनेक प्रोत्साहन शुरू किये और यह कार्यक्रम आगे बढ़ाया । करीब फरवरी सन 68 तक संविद सरकार चल सकी और परस्पर अन्तविरोधों के कारण अपने ही बोझ से टूट गई। एक साल तक उत्तर प्रदेश राष्ट्रपति शासन के आधीन रहा। मार्च 1966 में फिर चुनाव हुआ। श्री खाँ भारतीय क्रान्तिदल के टिकट पर स्वार से चुनाव लड़े मगर लगभग दो हजार से कुछ कम वोटों से हार गए । 1970-71 में उन्होंनेभारतीय क्रांति दल छोड़ दिया और बाद में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। भारतीय क्रान्ति दल छोड़ने का कारण उनके अनुसार यह था कि एक बड़े पूंजीपति जनाब रामबहादुर ओबरॉय (होटल समूह के मालिक) इस पार्टी के टिकट पर राज्य सभा में लाए जा रहे थे।
फिलहाल श्री अख्तर अली खां किसी पार्टी विशेष में खास सक्रिय नहीं हैं। वह गैर-राजनैतिक तो शायद नहीं कहे जा सकते, तो भी सामाजिक कार्यों में आजकल उनका लगाव ज्यादा है। कह सकते हैं कि वह किसी खास पार्टी के लेबल से सिमटे नहीं हैं। आजकल श्री अख्तर अली खां स्थानीय *जामा मस्जिद की प्रबंध समिति* के पांच-छह साल से सेक्रेट्री हैं। मस्जिद की आय केवल बत्तीस हजार है जबकि इसका खर्च करीव 70 हजार है। शेष धन चंदे से आता है ,जिसे पाने के लिए श्री अख्तर अली खां विशेष रूप से प्रयास करते रहे हैं। श्री अख्तर अली खां धर्म और इस्लाम में यकीन रखते हैं। वह मानते हैं कि समाज की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, दूसरों के दुख को अपना दुख समझना ही धर्म है और किसी को किसी तरह की तकलीफ न पहुंचने देने की कोशिश ही धर्म है। जिस कार्य से हमें तकलीफ पहुंचती हो, वैसा व्यवहार दूसरों से नहीं करना ही धर्म है। वह कहते हैं कि रोजा और नमाज भले ही एक दफा को छूट जाए तो भी अल्लाह माफ कर देगा । मगर निर्दोष मानवता का दिल दुखाना, उसे तकलीफ देना ,-अल्लाह कभी माफ नहीं कर सकता। लोगों को सच्ची खिदमत से अल्लाह खुश होता है। जाहिर है कि श्री खां की विचारधारा विशुद्ध रूप से मानवतावाद से प्रेरित है। उनकी सादगी और मृदुता किसका मन नहीं मोह लेगी? जिन्हें उनके मंत्री-काल की याद है – वह जानते होंगे कि मंत्री बनने-न बनने में कोई फर्क अख्तर साहब में कभी नहीं आया, कभी नहीं रहा। वह सदा सहज रहे। जब मंत्री बने तो भी कहा—मकान में गार्ड की जरूरत नहीं है। अपने निजी काम के लिए अपनी गाड़ी का ही इस्तेमाल करने वाले मंत्री कितने रहे होंगे ? अख्तर साहब का यही सोच, ईमानदारी, सच्चाई और निःस्वार्थ सेवा-वृत्ति उन्हें मौजूदा राजनीतिज्ञों में एक अलग कोष्ठक में बिठाती है । उन्होंने अपने निष्कपट व्यवहार से जनमानस में आदर और सम्मान अर्जित किया है । उन्होंने ओछी राजनीति कभी नहीं की। उनकी राजनीति ऊंचे कद की रही। वह राजनीतिक जरूर हैं, मगर गैर-राजनीतिक से लगते हैं।
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*लेखक : रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा*
*रामपुर (उत्तर प्रदेश)*
*मोबाइल 9997615451*
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(यह लेख श्री अख्तर अली खाँ से 18 दिसंबर 1985 को रवि प्रकाश द्वारा की गई भेंटवार्ता के आधार पर 28 दिसंबर 1985 को सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक रामपुर में प्रकाशित हो चुका है।)

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