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शायद

शायद किसी दिन
मैं उस भीड़ भरे कमरे के
उस पर देख पाऊंगा
वो जानी पहचानी सी आंखें
और बस

फिर दिल नहीं धड़केगा
और ना ही तब किसी
चमत्कार का इंतज़ार
बस एक मुस्कुराहट होगी
पिछली ज़िन्दगी की याद दिलाती

शायद किसी दिन एक खत मिलेगा
जिसे पढ़कर कुछ यादें ताज़ा होंगी
या शायद भूल जाऊंगा कि
कोई खत भी मिल था मुझे

शायद किसी दिन तुम मुझे
देखोगी, आवाज़ लगाओगी
मुझे वो सब कुछ याद दिलाओगी
वो घर जहां का रास्ता मैं भूल गया था
शायद

–प्रतीक

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