Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
17 Jun 2023 · 1 min read

वक्त क्या बिगड़ा तो लोग बुराई में जा लगे।

वक्त क्या बिगड़ा तो लोग बुराई में जा लगे।
छोड़कर पुरानी रीत लोग रूबाई में जा लगे।
कोशिशें तमाम करके छोटा न कर सके प्रखर।
पैरों के नीचे तब यही लोग खुदाई में जा लगे।।

सत्येन्द्र पटेल ‘प्रखर ‘

425 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
Books from सत्येन्द्र पटेल ‘प्रखर’
View all
You may also like:
तन को सुंदर ना कर मन को सुंदर कर ले 【Bhajan】
तन को सुंदर ना कर मन को सुंदर कर ले 【Bhajan】
Khaimsingh Saini
नये अमीर हो तुम
नये अमीर हो तुम
Shivkumar Bilagrami
👉बधाई👉 *
👉बधाई👉 *
*प्रणय प्रभात*
यादों में ज़िंदगी को
यादों में ज़िंदगी को
Dr fauzia Naseem shad
*** मुफ़लिसी ***
*** मुफ़लिसी ***
Chunnu Lal Gupta
अछूत
अछूत
Lovi Mishra
*करते हैं पर्यावरण, कछुए हर क्षण साफ (कुंडलिया)*
*करते हैं पर्यावरण, कछुए हर क्षण साफ (कुंडलिया)*
Ravi Prakash
इंटरनेट
इंटरनेट
Vedha Singh
"कड़वी ज़ुबान"
Yogendra Chaturwedi
"सुनो तो"
Dr. Kishan tandon kranti
Acrostic Poem
Acrostic Poem
jayanth kaweeshwar
ਹਾਸਿਆਂ ਵਿਚ ਲੁਕੇ ਦਰਦ
ਹਾਸਿਆਂ ਵਿਚ ਲੁਕੇ ਦਰਦ
Surinder blackpen
2319.पूर्णिका
2319.पूर्णिका
Dr.Khedu Bharti
बेटियां ?
बेटियां ?
Dr.Pratibha Prakash
हे मानव! प्रकृति
हे मानव! प्रकृति
साहित्य गौरव
** मुक्तक **
** मुक्तक **
surenderpal vaidya
मजबूरियां रात को देर तक जगाती है ,
मजबूरियां रात को देर तक जगाती है ,
Ranjeet kumar patre
नन्हीं परी आई है
नन्हीं परी आई है
Mukesh Kumar Sonkar
दुनिया के हर क्षेत्र में व्यक्ति जब समभाव एवं सहनशीलता से सा
दुनिया के हर क्षेत्र में व्यक्ति जब समभाव एवं सहनशीलता से सा
Raju Gajbhiye
" हर वर्ग की चुनावी चर्चा “
Dr Meenu Poonia
कभी कभी अच्छा लिखना ही,
कभी कभी अच्छा लिखना ही,
नेताम आर सी
जै जै जै गण पति गण नायक शुभ कर्मों के देव विनायक जै जै जै गण
जै जै जै गण पति गण नायक शुभ कर्मों के देव विनायक जै जै जै गण
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
सुविचार..
सुविचार..
राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
"ज्वाला
भरत कुमार सोलंकी
नारी क्या है
नारी क्या है
Ram Krishan Rastogi
ग़रीबी भरे बाजार मे पुरुष को नंगा कर देती है
ग़रीबी भरे बाजार मे पुरुष को नंगा कर देती है
शेखर सिंह
यह जो आँखों में दिख रहा है
यह जो आँखों में दिख रहा है
कवि दीपक बवेजा
यूं ही नहीं हमने नज़र आपसे फेर ली हैं,
यूं ही नहीं हमने नज़र आपसे फेर ली हैं,
ओसमणी साहू 'ओश'
गुजरा वक्त।
गुजरा वक्त।
Taj Mohammad
Mai koi kavi nhi hu,
Mai koi kavi nhi hu,
Sakshi Tripathi
Loading...