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3 Jun 2023 · 1 min read

* रेल हादसा *

डॉ अरुण कुमार शास्त्री

* रेल हादसा *

किसी को ले गई , किसी को छू कर निकली ।
ये मौत भी अजीब शे है बड़ी वे वफ़ा निकली ।
कहीं गम का कहीं दर्द का माहौल बन गया ।
किसी को बख्श दिया , किसी को लेकर निकली ।
है बिना हिसाब का हिसाब इस नामुराद का ।
कोई भी मुक्तसर वक्त है क्या इस बे नकाब का ।
तड़फता कोई तो कोई है उम्मीद से अस्पताल में ।
किसी की टूट गई हड्डी पसली , किसी की साबुत निकली ।
फँसें हुये थे सीटों के बीच सैंकड़ों बशर दर्द के मारे ।
के मिली इमदाद वक्त पर किसी की जाँ निकली ।
सफ़र महज कुछ घंटों का अंतहीन वाकया बन जायेगा ।
ऐसे हालात से गुजरेंगे चीखो पुकार का आलम पेश आयेगा ।
मदद इलाही चंद सिक्कों की ए मौला तू इस तरह दिलायेगा ।
किसी को ले गई , किसी को छू कर निकली ।
ये मौत भी अजीब शे है बड़ी वे वफ़ा निकली ।

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