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18 Aug 2023 · 1 min read

ये कमाल हिन्दोस्ताँ का है

ताज़ीम आरती की है आदर अज़ाँ का है
दुनिया में ये कमाल तो हिन्दोस्ताँ का है

गंदी सियासतों ने बहारों को खा लिया
मौसम हमारे गांव में भी अब खज़ाँ का है

नाहक ही दुश्मनों को यह इल्जाम दे दिया
गुलशन उजाड़ने का जतन बाग़बाँ का है

तुम ज़लज़लों के खौफ से वाक़िफ़ नहीं रहे
इतना ग़ुरूर आज यह ऊँचे मकाँ का है

आंखों को क्या शऊर किसी की नहीं रहा
दुनिया में हर शिकार तुम्हारी कमाँ का है

उनवान जो हमारी कहानी का था कभी
किरदार अब वह और किसी दास्ताँ का है

होता है फैज़याब जहाँ से जहान सब
‘सुनते हैं वो मकान किसी ला मकाँ का है’

‘अरशद’ नहीं है कोई गिला गैर से हमें
गद्दार है तो कोई इसी कारवाँ का है

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