Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
9 Sep 2016 · 1 min read

यादें

जैसे कोई बुझता हुआ दीपक ,
तेज रोशनी से अँधेरे को रोशन कर जाए ।
यादों से आज भी कुछ गुलशन महके हुए लगते है ।

मस्ती कहाँ थी जाम को पीने की ,
वो तो मजबूरी थी यादों को भुलाने की
पीने दे ऐ साकी फिर से तेरी नजरों से
आज भी कशिश है बाकी उनकी यादों की ।।

कभी सोचा था वीराने भी किसी सजा से कम नहीं ,
आज जाने क्यों वो खंडहर भी अपने जैसे लगते हैं ।

Language: Hindi
Tag: कविता
295 Views
You may also like:
राखी त्यौहार बंधन का - डी के निवातिया
डी. के. निवातिया
कभी क्यो दिल जलाते हो तुम मेरा
Ram Krishan Rastogi
जिंदगी में जो उजाले दे सितारा न दिखा।
सत्य कुमार प्रेमी
एक रात का मुसाफ़िर
VINOD KUMAR CHAUHAN
योग छंद विधान और विधाएँ
Subhash Singhai
ज़मीर की आवाज़
Shekhar Chandra Mitra
Affection couldn't be found in shallow spaces.
Manisha Manjari
अतीतजीवी (हास्य व्यंग्य)
Ravi Prakash
✍️सारे अपने है✍️
'अशांत' शेखर
यह नज़र का खेल है
Shivkumar Bilagrami
गजल
जगदीश शर्मा सहज
उसूल
Ray's Gupta
परिकल्पना
संदीप सागर (चिराग)
छद्म राष्ट्रवाद की पहचान
Mahender Singh Hans
सिपाही
Buddha Prakash
मन के गाँव
Anamika Singh
कैसे कोई उम्मीद
Dr fauzia Naseem shad
✍️न जाने वो कौन से गुनाहों की सज़ा दे रहा...
Vaishnavi Gupta (Vaishu)
कश्मीर की तस्वीर
DESH RAJ
गंगा दशहरा
श्री रमण 'श्रीपद्'
रूबरू होकर जमाने से .....
लक्ष्मण 'बिजनौरी'
इंतजार का....
Umesh उमेश शुक्ल Shukla
उपहार
विजय कुमार 'विजय'
घर की पुरानी दहलीज।
Taj Mohammad
अगर की हमसे मोहब्बत
gurudeenverma198
प्रेम कथा
Shiva Awasthi
निगाह-ए-यास कि तन्हाइयाँ लिए चलिए
शिवांश सिंघानिया
आव्हान - तरुणावस्था में लिखी एक कविता
HindiPoems ByVivek
عجیب دور حقیقت کو خواب لکھنے لگے۔
डॉ सगीर अहमद सिद्दीकी Dr SAGHEER AHMAD
अक्सर
Rashmi Sanjay
Loading...