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16 Feb 2024 · 2 min read

मोबाइल

प्रदूषण से घिरे इस परिवेश में, कोई प्रकृति का इशारा नहीं बनता।
स्वार्थ को आतुर इस दुनिया में, कोई बेबस का सहारा नहीं बनता।
आज निराशा का काला बादल, सबकी उम्मीदों के ऊपर छा गया।
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

हाथ व दीवार से घड़ियाँ गायब, घर में धूल फांक रहा कैलकुलेटर।
ये मोबाइल ही तिथि बताता है, अब कोई नहीं चाहता है कैलेण्डर।
हमें तो बताया गया है, 5G व 7G का तकनीकी ज़माना आ गया।
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

यूॅं मूक-बधिर बनी दुनिया, मन व मंचों से वार्तालाप लुप्त हो गया।
रिश्तों में बेपरवाही, बढ़ गई लापरवाही, भाग्य भी सुषुप्त हो गया।
संवाद आज भी बहुत ज़रूरी हैं, ये यही सत्य सबको बतला गया।
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

अब सभी खेल सिमट रहे हैं, मोबाइल की छोटी स्क्रीन के अन्दर।
यह यन्त्र बन गया है मदारी, जो रोज़ नचा रहा इंसान रूपी बन्दर।
जो यंत्र उंगलियों पे नचाने चला था, उसे तो यह यंत्र ही नचा गया।
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

हादसों में कुछ यूं जान चली गई, समय से इलाज नहीं मिल पाया।
सबके हाथों में मोबाइल था, कोई अपनी जगह से नहीं हिल पाया।
क्या देखना और सुनना पड़ा?, हाय! अब ये कैसा समय आ गया।
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

पुराने ज़माने में लोग, सबकी परेशानियों में ख़ुद को सता लेते थे।
पहले तो लोग चेहरा देखकर, लोगों की तबीयत तक बता देते थे।
हाल-चाल पूछने का पुराना दौर, न जाने क्यों अंधेरे में चला गया?
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

मोबाइल में खोए व्यक्ति को लगे, उसकी ख़ूब वाहवाही हो रही है।
हालांकि उसके ऐसे रवैए की, अब खुलकर जगहँसायी हो रही है।
अपने ही घर की खुशियाँ और ग़म, यह सबके हृदय से भुला गया।
मोबाइल रूपी एक आधुनिक राक्षस, हृदय का हर भाव खा गया।

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