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13 Jun 2016 · 1 min read

मैं खामोश रहती हूँ

मैं बस खामोश रहती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है
ज़बाँ क़ाबू में रखती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

नहीं सोती हूँ रातों को फ़क़त करवट बदलती हूँ
मैं शब् में तारे गिनती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

पकड़ कर हाथ गैरों का दिखाते राह भी तुम हो
मैं अपनी राह चलती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

बिन झपके पलक मैं तो तुम्हारी राह तकती हूँ
हमेशा रोती रहती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

बहुत से लोग रहते हैं शहर की भीड़ है कितनी
अकेली , मैं तो रहती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

सभी को जाम देते हो , कोई प्यासा नहीं फिर भी
मैं तिश्ना लब भटकती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

बहुत सी अश्क की बूँदें रुकी है मेरी पलकों पर
यही मोती लुटाती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

मरीज़ ए इश्क़ हूँ मेरी दवा तुम भी नहीं देते
अनु मैं टूट जाती हूँ तुम्हे क्या फर्क पड़ता है

अनु सिंह राजपूत

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