मेरे देश का किसान

गर्मियों की ढलती शाम को
उसके बदन पर जमी मिट्टी
कपड़ो से कुछ साफ़ हुई सी दिखती है

हाथ उसके भूरे काले
जैसे की पेड़ के तने से
लटकी हुई शाखें लगती है

काले सफ़ेद से बाल उसके
सिर पर बिखरे हुए कुछ ऐसे
कुछ हिस्से मिट्टी से सने कंधों पर
टिके हुए से लगते हैं

एक फटा हुआ सा कुर्ता
उसके गठीले बदन को
ढकने को कोशिश कर रहा है

नंगे पैरों से खेतों में चलता हुआ
मिट्टी से पैरों को रंगता हुआ
कमर पर बंधे गमछे से
चेहरे के पसीने को पोंछ रहा है

आकाश की तरफ टकटकी लगाए
बादलों में बारिश तलाशता
हर साल की तरह इस साल भी
हैरान, निराश, परेशान
मेरे देश का किसान

–प्रतीक

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