मेरा ठिकाना-७—मुक्तक—डी के निवातिया

तेरे दिल के खंडहर में पड़ा है फटा-टुटा बिछाना
कल होते थे जहाँ पल गुलजार, आज है वीराना
अल्फाज लंगड़े हो गये, जज्बातो की ज़ुबाँ गयी
देह तो बेजान है रूह तलाश रही है मेरा ठिकाना !!
!
!
!______डी के निवातियाँ ____!

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