मेरा ठिकाना-1—मुक्तक —(डी के निवातियाँ)

अक्सर लोग पूछते है मुझसे मेरा ठिकाना
मै ठहरा बेघर परिंदा नही कोई आशियाना
ठोकरे खाता फिरता हूँ सफर ऐ जिन्दगी में
पा जाऊं मंजिल जिस रोज़, वही चले आना ।।



डी के निवातियाँ_____@@@

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