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29 Jun 2016 · 1 min read

मुस्कुराता हूँ तो गम बढ़ता नहीं

मुस्कुराता हूँ तो गम बढता नही
डर से आंसू ही मेरा निकला नहीं

प्यार में रुसवा हो तो औरत ही क्यों
मर्द पे इल्जाम क्यों लगता नहीं

लूटने रहबर लगे गर काफिला
रास्ता कोई भी फिर बचता नहीं

कह दिया सो कर दिया पक्की जुबाँ
वायदे से पीछे वो हटता नहीं

बरगदों की छाँव मिलती गाँव में
पर वहां अब मैं कभी ठहरा नहीं

पत्थरों की ठोकरों से डर गया
आइना बाहर कभी निकला नहीं

माफ़ करना उसको मुश्किल तो न था
गर जुबाँ से जलजला उठता नहीं

अब यहाँ धोखा ही धोखा निर्मला
सच तुम्हारा काम अब आता नही

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