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3 Feb 2024 · 1 min read

मुझ जैसा रावण बनना भी संभव कहां ?

काव्य गोष्ठी
प्रभु श्री राम बनना असंभव है
मुझ जैसा रावण बनना भी संभव कहां ?

कुछ अवगुण थे मेरे अंदर
सौ गुण थे भर भर कर ,

वो गुण अपने अंदर लाओ
एक पल में मुझ जैसा रावण बन जाओ ,

सबक लो सब मुझसे हर पल
नहीं आता कभी पलटकर कल ,

कहता हूं कुछ तो सीख लो मुझसे
मेरे गुण हुए तुच्छ सबसे ,

सौ गुणों पर एक अवगुण भारी है
ये बात सीखने की अब सबकी बारी है ,

बिना एक भी अवगुण के अयोध्यापति
मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्री राम कहलाये ,

अहंकार/व्यभिचार का अवगुण लेकर के मैं दशानन
लंकापति से सिर्फ रावण कहलाया ,

कुछ तो कर्म अच्छे अवश्य होंगे मेरे
मेरी मुक्ति के लिए प्रभु को आना पड़ा राम बन के ,

ये सच है कि राम बनना असंभव है
पर मुझ जैसा रावण बनना भी संभव कहां ?

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा )

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