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5 Jan 2024 · 1 min read

मुक्तक

मुक्तक

छाया है कुहरा घना,बहुत अधिक है शीत।
मार्ग नहीं दिखता कहीं,सब राही भयभीत।
विकट परिस्थिति है बनी,फँसी मुसीबत जान,
मौसम के आगे नहीं, संभव लगती जीत।।
डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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