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माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला………………..

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला

राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह
दहाड़े थे आजाद बनकर सिंह
मैं भी उनके पथ पर चलकर
मनवाऊँ अपने नाम का लोहा !

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

गाँधी, पटेल, बहादुर के जैसा
बन जाऊं माँ ,मैं भी उन जैसा
देश के खातिर प्राण त्यागकर
बना लूंगा सुभाष के जैसी सेना !

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

जब कभी भी हो खतरे में माता
पल भर मुझको चैन ना आता
टूट पडूंगा मैं दुश्मन पर नीडर
बाँध सीने पर बारूद का गोला !

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

सबसे सुन्दर, सबसे प्यारा
दुनिया में जो सबसे न्यारा
देश विदेश में किधर नही है
मेरे “भारत” नाम का रोला !

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

भारत माता जान से प्यारी
इस पर वीरो ने जान वारी
नजर उठाकर कोई जो देखे
मैं बन जाऊँगा दहकता शोला !

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

जब हाथ में लेकर चलू तिरंगा
दुश्मन का मन क्यूँ होता गंदा
संग लड़ी थी आजादी की जंग
खून भी सबका संग था खोला !

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

एक आसमान था, एक थी जननी
फिर जाने क्यूँ हम दुश्मन बन बैठे
संग में जो हम तुम जो मिल जाये
फिर देखे कैसे दुनिया हम पर ऐठें
मिट जायेगा आतंकवाद का रोना

देश प्रेम की धुन बजाता आज फिर निकला वीरो का डोला !
संग में उनके मैं भी जाऊं, माँ मेरा भी रंग दो बसंती चोला !!

!
!
!
रचनाकार ::->> डी. के. निवातियाँ _________!!!!!!!

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