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माँ की संदूकची —–कविता

माँ की संदूकची

माँ तेरी सीख की संदूकची,

कितना कुछ होता था इस मे

तेरे आँचल की छाँव की कुछ कतलियाँ

ममता से भरी कुछ किरणे

दुख दर्द के दिनों मे जीने का सहारा

धूप के कुछ टुकडे,जो देते

कडी सीख ,जीवन के लिये

कुछ जरूरी नियम

तेरे हाथ से बुनी

सीख की एक रेशम की डोरी

जो सिखाती थी

परिवार मे रिश्तों को कैसे

बान्ध कर रखना

और बहुत कुछ था उसमे

तेरे हाथ से बनी

पुरानी साढी की एक गुडिया

जिसमे तेरे जीवन का हर रंग था

और गुडिया की आँखों मे

त्याग ,करुणा स्नेह, सहनशीलता

यही नारी के गुण

एक अच्छे परिवार और समाज की

संरचना करते हैं

तभी तो हर माँ

चाव से दहेज मे

ये संदूकची दिया करती थी

मगर माँ अब समय बहुत बदल गया है

शायद इस सन्दूकची को

नये जमाने की दीमक लग गयी है

अब मायें इसे देना

“आऊट आफ” फैशन समझने लगी है

समय की धार से कितने टुकडे हो गये है

इस रेशम की डोरी के

अब आते ही लडकियाँ

अपना अलग घर बनाने की

सोचने लगती हैं

कोई माँ अब डोरी नही बुनती

बुनना सिलना भी तो अब कहाँ रहा है

अब वो तेरे हाथ से बनी गुडिया जैसी

गुडिया भी तो नही बनती

बाजार मे मिलती हैं गुडिया

बडी सी, रिमोट से चलती है

जो नाचती गाती मस्त रहती है

ममता, करुणा, त्याग, सहनशीलता

पिछले जमाने की

वस्तुयें हो कर रह गयी हैं

लेकिन माँ

मैने जाना है

इस सन्दूकची ने मुझे कैसे

एक अच्छे परिवार का उपहार दिया

और मै सहेज रही हूँ एक और सन्दूकची

जैसे नानी ने तुझे और तू ने मुझे दी

इस रीत को तोडना नही चाहती

ताकि अभी भी बचे रहें

कुछ परिवार टूटने से

और हर माँ से कहूँगी

कि अगर दहेज देना है

तो इस सन्दूकची के बिना नही

3 Comments · 354 Views
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