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8 Feb 2024 · 1 min read

” महक संदली “

नवगीत

तन को छूकर दहकी ,
महक संदली !!

स्पर्श हुआ जो तेरा
लिपट गये हम !
खुद में ही लगता है ,
सिमट गये हम !
कैसे नज़र मिलाएं ,
मची खलबली !!

धड़कन की धक धक को ,
भाँप गये हम !
बिजली कौंधी ऐसी ,
काँप गये हम !
अधरों की लरजन भी ,
बन गयी छली !!

आँचल छूटा कर से ,
ढलित सा लगा !
जियरा भी बस में ना ,
चलित सा लगा !
लाज निगोड़ी बैरन ,
ना बनी बली !!

थिरक गई जब लाली ,
पुलक गात पर !
मुंदे रह गये नयन ,
मदिर बात पर !
हैं गुलाब महके से,
हवा न संभली !!

तटबंधों पर जमकर ,
चुहल हो गयी !
अनचाही से कैसी ,
पहल हो गयी !
हटा वक्त का पहरा ,
अपनी न चली !!

जहाँ भावना पलती ,
मन मगन लगे !
रस भीनी इच्छाऐं ,
हैं मगर ठगे !
नहीं रहा कुछ संचित ,
यादें पगली !!

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

Language: Hindi
2 Likes · 1 Comment · 229 Views
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