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20 Sep 2022 · 1 min read

मगर अब मैं शब्दों को निगलने लगा हूँ

जमाने के रंगों में मैं यूँ ढ़लने लगा हूँ ।
न चाहकर भी खुद को बदलने लगा हूँ ।।

कभी सोचा था जिन राहों पे चलना ।
जाने क्यों उन्ही से मैं अब टलने लगा हूँ ।।

जो लोग कभी मुझको लगते थे अपने ।
उन्ही से बचकर मैं अब निकलने लगा हूँ ।।

हकीकत समझने लगा हूँ जिंदगी की ।
झठे ख्वाबों,खयालों को कुचलने लगा हूँ ।।

गिला शिकवा मुझको किसी से नहीं है ।
पर खुद की ज्वाला में ही जलने लगा हूँ ।।

बहुत सोचता था कोई कुछ भी कहता ।
मगर अब तो शब्दों को निगलने लगा हूँ ।।

‘विनोद’ मुझको भी सच्च बता दो जरा ।
मैं आज गिरने लगा कि सम्भलने लगा हूँ ।।

8 Likes · 4 Comments · 238 Views
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