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बन्धन

लघुकथा
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बंधन
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“आज फिर आप देर से आये हो ” उसका यह पूछना था कि सुमित सलोनी पर टूट पड़ा “तुम्हें क्या पता पैसा कमाने के लिये क्या क्या जतन करने पड़ते हैं , तुम तो पूरा दिन घर में ऐश ही करती हो ” ये बात आज की नहीं थी कुछ दिनों से सुमित का व्यवहार बदला बदला सा था । सलोनी तो अपने रिश्ते पर पूरा भरोसा किये बैठी थी पर जाने कहीं से काजल नाम की आरी उस पर चल चुकी थी। एक साल ही हुआ था विवाह को कि सुमित अपनी पुरानी प्रेमिका को भुला न पाया और वहीं जाने लगा था।
पहले तो सलोनी सास के ये कहने पर “समाज में क्या इज़्ज़त रह जायेगी” के कारण चुप रही। लेकिन बाद में पुरानी सब बातें और उसकी अनुपस्थिति में काजल का उसके घर आकर रहने जैसे दिल को आघात पहुंचाने वाले सभी रहस्यों का खुलासा होने लगा। जिससे दोनों में रोज रोज की कच कच होने लगी । विश्वास की डोर टूट जाने से सलोनी छटपटाने लगी ।
पिता ने बड़े धूमधाम से शादी की थी। किन्तु विवाह जैसा पवित्र बन्धन अब उसे किसी फंदे से कम नहीं लग रहा था, वो तोड़ देना चाहती थी हर फरेबी बन्धन ! पर इतना आसान नहीं था ऐसा करना । ससुराल में सभी जानते थे सुमित के प्रेम प्रसंग को फिर भी सलोनी और उसके घरवालों से छिपाया गया । सुमित माता-पिता के दबाव के कारण और बेकार की दलील कि शादी के बाद सब ठीक हो जाता है के कारण एक लड़की की ज़िन्दगी तबाह करने को तैयार हो गया चूँकि वह जिस लड़की को पसंद करता था वो दूसरी बिरादरी की थी जो उसके घरवालों को कतई मंजूर नहीं थी ।
बेचारी सलोनी के सपने बेदर्दी से कुचले गये । उसने इस बंधन से आज़ादी को ही अपनी तकदीर बनाया । उसने एक अच्छे इंसान से पुनर्विवाह किया, आज अपने पति और दो बच्चों के साथ सुखी है । उसने सिद्ध किया कि कई बार माता पिता भी गलत फैसले लेकर औलाद को अज़ीब बन्धन में जकड़ देते हैं पर ज़िन्दगी सभी को दूसरा मौका दे ये जरुरी नहीं !

@डॉ. अनिता जैन “विपुला”

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