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Jul 15, 2016 · 1 min read

बन्दरबांट

मित्रो, प्रस्तुत है मेरी एक पुरानी व्यंग्य रचना, शीर्षक है – ‘बन्दरबांट l यह रचना कुछ वर्ष पूर्व ‘अमर उजाला’ में मेरे वास्तविक नाम (राजीव कुमार सक्सेना) से प्रकाशित हुई थी –

सरकारी लट्टू ने पुन:चक्कर लगाया,
और, विद्यार्थियों के लिये दोपहर का भोजन,
आखिरकार विद्यालय में आया l
इस भोजन की सुलभता और पौष्टिकता,
अपना कमाल दिखाने लगी l
तभी तो गुरुजी की उपस्थिति,
विद्यालय में प्रतिदिन,
शत-प्रतिशत नज़र आने लगी l
अजी, अब तो बड़े साहब भी अपना दायित्व,
बखूबी निभाते हैं l
तभी तो उनके घरेलू बर्तन,
विद्यालय की शोभा बढ़ाते हैं l
नौनिहालों का पेट, आकाओं की नीयत,
वाह, क्या मेल है l
अजी, इस मेल के आगे तो,
बन्दरबांट भी फ़ेल है l
???
– राजीव ‘प्रखर’
मुरादाबाद
मो. 8941912642

3 Comments · 238 Views
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