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14 Jun 2016 · 1 min read

बच्चे नहीं जानते अभी

बच्चे नहीं जानते अभी
कि कैसे फूटती हैं यादें
मील के पत्थरों से
बच्चे यह भी नहीं जानते
कि किस तरह इंतजार करता है घर
ललक उठता है देहरी का मन
और किस तरह
झाँक उठती हैं मुँडेरें
बच्चे यह भी नहीं जानते
कि आंगन में लेटे
पिता की खामोशी कितना चीखती है
और रसोई में रोटी सेकतीं
माँ की उँगलियाँ
बार बार गर्म तवा कयों छू लेतीं हैं
ये सब तभी जानेंगे बच्चे
जब बरसों बाद लौटेंगे घर !

Language: Hindi
Tag: कविता
2 Comments · 547 Views
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