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18 Feb 2024 · 1 min read

फागुन की अंगड़ाई

मधुमास की खुशबू बिखरने लगी है
किंशुक कुसुम से चमकने लगी है
आमों की बौरों से गमकने लगी है
कोयल की कूक से चहकने लगी है

सखी साजन अभी तक नहीं आये
नैन प्रीतम की राह तकने लगे हैं
सनम बेवफा परदेश गये ही क्यों
दिल में एक हूक सी उठने लगी है

फागुन ने ले ली है अंगड़ाई
सही नहीं जाती अब बेवफाई
पपीहा सी रटती पी कहाँ पी कहांँ
ओम सोलह श्रृंगार से सजने लगी है

ओमप्रकाश भारती ओम्
बालाघाट, मध्य प्रदेश

Language: Hindi
108 Views
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