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5 Jul 2023 · 1 min read

फ़ब्तियां

लोग आए और हम पर फ़ब्तियां कसते रहे
फ़ब्तियां कसकर के हम पर देर तक हंसते रहे

कुछ ने हमको कुछ कहा, कुछ ने हमको कुछ कहा
ज़हर था जिनके दिलों में वो हमें डसते रहे

स्याह रातें जानती हैं कौन वो अपने हैं जो
ख़्वाब में आने से पहले आंख में बसते रहे

रोशनी किसने है देखी जश्न तक पहुंचा है कौन
धुंध से निकले हैं जो वो धूप में फंसते रहे

वक़्त ने की कोशिशें लाखों रुलाने की हमें
हम भी कोई कम न थे हम ‘वक़्त’ पर हंसते रहे

— शिवकुमार बिलगरामी

Language: Hindi
2 Likes · 180 Views
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