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2 Jun 2024 · 1 min read

प्रेमिका बन जाती है

आवाज़ दिल की पन्नों पे उतर आती है
फिर इस तरह एक कविता बन जाती है
बाकी ना रहे कुछ भी दिल के अन्दर
रहे तो कवि की जान पे बन आती है
पहन के लिबास कवि के भावों का
अपने आप पे ही फिर बड़ा इतराती है
समंदर की लहरों सी चंचल है बहुत
उठती -गिरती है,आती है चली जाती है
एक दूजे बिन नहीं रह सकते हैं दोनों
मैं प्रेमी और वो प्रेमिका बन जाती है
©ठाकुर प्रतापसिंह राणा
सनावद (मध्यप्रदेश )

Language: Hindi
28 Views
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