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पितृ वंदना

पितृ वंदना

देव का, ही रूप शास्वत, आप ही, हैं स्वर हमारे।
प्रेम का, पर्याय जग में, आप ही, ईश्वर हमारे।

आप से, ही भान हमको, क्या गलत, क्या कुछ सही है।
आप से, बढ़कर जगत में, देवता, कोई नहीं है।
आप बन्धु, आप शिक्षक, सदगुरू, सहचर हमारे।
प्रेम का, पर्याय जग में, आप ही, ईश्वर हमारे।

हे पिता! विश्वास की बस, आप ही, पहिचान सुंदर।
प्रात की, उस आरती का, आप हीं, हो गान सुंदर।
प्राण हैं, यदि हम अधिश्वर, आप ही, हो धर हमारे।
प्रेम का, पर्याय जग में, आप ही, ईश्वर हमारे।

आप बन, पीपल व बरगद, छाँव ही, देते रहे है।
हर बला, निज पुत्र जन की, आप ही, लेते रहे हैं।
हर व्यथा, हर विघ्न में हो, आप विघ्नेश्वर हमारे।
प्रेम का, पर्याय जग में, आप ही, ईश्वर हमारे।

ले मनुज, का रूप आये, आप पालनहार हो जी।
रुग्ण सा, दिखते मगर बस, मृदु सरल, व्यवहार हो जी।
आप से, पल्वित हुआ मै, आप सर्वेश्वर हमारे।
प्रेम का, पर्याय जग में, आप ही, ईश्वर हमारे।

आप का, पूजन करूँ मैं, बस यहीं, वरदान देना।
आप के, हिय में रहूँ मैं, तुच्छ सी, यह दान देना।
स्वर्ग सम, सुंदर व अद्भुत, आप हीं, हो घर हमारे।
प्रेम का, पर्याय जग में, आप ही, ईश्वर हमारे।

✍️ संजीव शुक्ल ‘सचिन’
मुसहरवा (मंशानगर)
पश्चिमी चम्पारण, बिहार

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