Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
14 Jul 2023 · 1 min read

#देसी_ग़ज़ल

#देसी_ग़ज़ल
■पीटते हैं ढोल वो।।
【प्रणय प्रभात】

मोल खो कर के बने बेमोल वो।
बोलते हैं बेतुके हर बोल वो।।

भेड़ बन के घूमते थे कल तलक।
शेर का ले आए हैं अब खोल वो।।

शोरबा देने का वादा भूल कर।
आज ले कर आ गए हैं झोल वो।।

उंगलियां कानों में जनता ठूंस ले।
इसलिए बस पीटते हैं ढोल वो।।

भौंकना इक दूसरे पर क्या ग़लत?
जानते इक दूसरे की पोल वो।।

●संपादक/न्यूज़&व्यूज़●
श्योपुर (मध्यप्रदेश)

1 Like · 149 Views
📢 Stay Updated with Sahityapedia!
Join our official announcements group on WhatsApp to receive all the major updates from Sahityapedia directly on your phone.
You may also like:
निर्बल होती रिश्तो की डोर
निर्बल होती रिश्तो की डोर
Sandeep Pande
जो धधक रहे हैं ,दिन - रात मेहनत की आग में
जो धधक रहे हैं ,दिन - रात मेहनत की आग में
Keshav kishor Kumar
तुम्हें क्या लाभ होगा, ईर्ष्या करने से
तुम्हें क्या लाभ होगा, ईर्ष्या करने से
gurudeenverma198
आ जाओ घर साजना
आ जाओ घर साजना
लक्ष्मी सिंह
तेवरी का आस्वादन +रमेशराज
तेवरी का आस्वादन +रमेशराज
कवि रमेशराज
सब्र करते करते
सब्र करते करते
Surinder blackpen
कट्टर ईमानदार हूं
कट्टर ईमानदार हूं
सुरेश कुमार चतुर्वेदी
सुबुधि -ज्ञान हीर कर
सुबुधि -ज्ञान हीर कर
Pt. Brajesh Kumar Nayak
23/29.*छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
23/29.*छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
Dr.Khedu Bharti
सुर्ख बिंदी
सुर्ख बिंदी
Awadhesh Singh
शमशान घाट
शमशान घाट
Satish Srijan
जीने दो मुझे अपने वसूलों पर
जीने दो मुझे अपने वसूलों पर
goutam shaw
कोई काम हो तो बताना
कोई काम हो तो बताना
Shekhar Chandra Mitra
पाखंड
पाखंड
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर
पलकों ने बहुत समझाया पर ये आंख नहीं मानी।
पलकों ने बहुत समझाया पर ये आंख नहीं मानी।
Rj Anand Prajapati
*यह  ज़िंदगी  नही सरल है*
*यह ज़िंदगी नही सरल है*
सुखविंद्र सिंह मनसीरत
कैलाश चन्द्र चौहान की यादों की अटारी / मुसाफ़िर बैठा
कैलाश चन्द्र चौहान की यादों की अटारी / मुसाफ़िर बैठा
Dr MusafiR BaithA
ख़्बाब आंखों में बंद कर लेते - संदीप ठाकुर
ख़्बाब आंखों में बंद कर लेते - संदीप ठाकुर
Sandeep Thakur
हर एक चोट को दिल में संभाल रखा है ।
हर एक चोट को दिल में संभाल रखा है ।
Phool gufran
मानवता
मानवता
Rahul Singh
गर्जन में है क्या धरा ,गर्जन करना व्यर्थ (कुंडलिया)
गर्जन में है क्या धरा ,गर्जन करना व्यर्थ (कुंडलिया)
Ravi Prakash
किस्मत का लिखा होता है किसी से इत्तेफाकन मिलना या किसी से अच
किस्मत का लिखा होता है किसी से इत्तेफाकन मिलना या किसी से अच
पूर्वार्थ
जीवन के उपन्यास के कलाकार हैं ईश्वर
जीवन के उपन्यास के कलाकार हैं ईश्वर
अनिल कुमार गुप्ता 'अंजुम'
अलगाव
अलगाव
अखिलेश 'अखिल'
सोच
सोच
Neeraj Agarwal
ये बिल्कुल मेरी मां जैसी ही है
ये बिल्कुल मेरी मां जैसी ही है
Shashi kala vyas
"जानो और मानो"
Dr. Kishan tandon kranti
धीरे-धीरे रूप की,
धीरे-धीरे रूप की,
sushil sarna
अजनबी
अजनबी
Shyam Sundar Subramanian
फिसल गए खिलौने
फिसल गए खिलौने
नील पदम् Deepak Kumar Srivastava (दीपक )(Neel Padam)
Loading...