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12 Feb 2024 · 1 min read

त्याग

कोयल कुहूक कर
माहौल गुंजा जाती है
बादल बरस कर
मिट जाते है
मधुमक्खी
शहद के छत्ते ही छत्ते
भर जाती है।
कितना अनुकरणीय है
यह आचरण।
न लालच है
न लोभ ।
मानव इन सबको
लपक कर,
झपट लेता है।
भोग लेता है।
और,
भूल जाता है
मानव, कभी नहीं सीखता।
किसी के लिए
बनना और उसकी
खुशी के लिए मिटना
मानव तो बस
फलता है फूलता है फैलता है
घमंड में ।
अंतिम सांस के समय
अफसोस करता है
खुद के भोगी होने पर।

डा पूनम पांडे

Language: Hindi
2 Likes · 76 Views
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