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5 May 2024 · 1 min read

*स्पंदन को वंदन*

डॉ अरुण कुमार शास्त्री – एक अबोध बालक अरुण अतृप्त

*स्पंदन को वंदन *

स्पंदन का जिसके जीवन में जरा सा भी अभाव रहेगा ।
मित्र सखी दोस्त सखा सहेली उस से दूर रहेगा ।

छु नहीं सकता जो कोमल भावों से एहसास किसी के ।
ऐसा मानव तो रे प्राणी राहू केतु के अगल बगल रहेगा ।

मैंने कब कहा के तुमसे कि मुझे तुमसे प्यार नहीं है ।
अब गुफ्तगू हुये कई अरसा हुआ तू कुसूरवार नहीं है ।

कमला विमला शिमला स्वीटी खरी खोटी सुनाती हैं ।
तो सुनाती रहेंगी , बहुत बुरी आदत है उनकी ये मज़ाक की ।

चलो फिर से उड़ने की कोशिश करेंगे चलो हाँथ पकड़ लो ।
देखो देखो , देखो तो जरा हाँथ पकड़ते ही हम उड़ने लगें हैं ।

एकता की गरिमा और शक्ति का अजब अज़ाब है दोस्तों ।
तेरे हाँथ में मेरे हाँथ का कितना प्यार हिसाब है दोस्तों ।

स्पंदन का जिसके जीवन में जरा सा भी अभाव रहेगा ।
मित्र सखी दोस्त सखा सहेली उस से दूर रहेगा ।

छु नहीं सकता जो कोमल भावों से एहसास किसी के ।
ऐसा मानव तो रे प्राणी राहू केतु के अगल बगल रहेगा ।

शनिवार को शनि महाराज को चड़ाने हम निकले तेल लेने ।
रास्ता बिल्ली ने काटा पलटे रास्ते से ही खुद ही फंस गए बीच झमेले ।

अब साहिब जी देखिए गाँव का गाँव है पुराने खयालात का ।
हम एक अकेले ही तो नहीं बौड़म इन बातों पे भरोसा करने वाले ।

2 Likes · 2 Comments · 34 Views
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