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3 Oct 2016 · 1 min read

झरोखा

जिन्दगी के हर पहलू मे मैने तुझको मुडकर देखा
जैसे किसी बन्द कमरे मे रोशनी का एक झरोखा

सब करते है इन्तजार आये तारो से सजी रात
फैले चांदनी ,बहे ठन्डी हवा का झोकां
मगर हाथ जोडकर मै करती हूम नमन
निकले न कभी चांद यहां का

जिसको चाहिए रोशनी जितनी,सहनी होगी तपिश भी उतनी
ये सच है मैने जान लिया,इस रहस्य को पहचान लिया
क्योकि हालातो की अग्नि मे मैने आहुति बनकर देखा

जैसे किसी बन्द कमरे मे रोशनी का एक झरोखा

Language: Hindi
Tag: कविता
1 Comment · 704 Views
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