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22 Dec 2023 · 12 min read

जीवन के रूप (कविता संग्रह)

प्रस्तुत संग्रह पूर्णतः स्वरचित है। छंद मुक्त कवितायें जीवन के विविध रूपों को दर्शाने का प्रयास है। आशा है पसंद आयेगा।

लंबी कविता ..अतुकांत .एकाकी मन जब विचलित होता ,शब्द कुछ खुद ही बुन लेता। क्यों, कब, कैसे ,कहाँ ..अनुत्तरित रहते सवाल। तब उतरते मन मरुथल पर कुछ शब्द।ऐसी ही कुछ रचनाये़ं हैं।
पाखी
*****************************
1– लोहे सा मन
वह ,जो आज इन ऊँचाइयों को छू रहा है .।
क्या लगता है ?
उसका कोई अतीत नहीं?
पग में चुभे कंकड़ नहीं ?
किसी ने उसको ,या उसी ने किसी को
कभी चाहा नहीं?
क्या बिन संघर्ष छुआ है उसने शिखर !!,
या मिली कोई गुप्त विधा .।
जादूगरी की ,अय्यारी की या
लगा कोई कोष हाथ उसके ?

खेतों में करते मजदूरी
फावड़े ,कुल्हाड़ी चलाते
हल का जुआ थामते .
या फिर खड़ी फसल काटते
कभी देखा होगा दिवास्वप्न!!

क्या उसे भी लड़ना पड़ा
अभावों से
व्यवस्थाओं से !!

रिश्तों को निभाना
सीखा होगा या
मारा होगा अपना मन ?
कभी मचलती इच्छाओं के चलते
सीमित पैसों से की होगी इच्छा पूर्ति
और बदले में क्या सही होगी प्रताड़ना!,
डाँट,फटकार के साथ भूखे रहने की सजा!!
आज जो शिखर पर है थामे कलम
उन हाथों ने पकड़े होंगे क्या कभी
तसल्ल,गैंती या पेचकस ,हथोड़ी।
कसे होगे नट बोल्ट ..
या फिर लोहे के संसर्ग में रह
निखारे होगे शब्द मन ही मन ।
*********************************
2– हथोड़ी

हथोडी की हर चोट से
बिखरे जज्बात
टूटते स्वप्न या कि
ठोकी जाती कील के
दरम्यान आई हथेली
और रूह तक सिहर जाता मन।
क्या कचोटते होंगे तब भी
शब्द ,अर्थ और ध्वनित स्वर ।।

क्या ग्रिल मशीन से करते छेद
मन की दरारों में हुआ होगा,
कंपन ,थरथराहट या फिर
बहे स्वेद कणों से फूटती
एक धारा ..अहसासों की ।

झुलसती गर्मी में ,पाटों को
जोड़ने की जुगत
या सर्द मौसम में ,ठेलते
नंगे हाथों से वजन
भावों की सरिता में
उर्मियाँ तो उठी होंगी न !!
सहमी सी कोई सूरत तत्क्षण
नयनकोर में झांकी तो होगी न!!

लिखा होगा उच्छवासों के
आरोह अवरोहों के बीच
चुपके से कोई खत
खेतों के बीच छुप के या
नहर के पास बैठ के ।
बड़े से आँगन का कोई
खुला सा कोना
या फिर चोरी से खरीदी
गयी़ किताबों के बीच
रख कागज़ ।।
*******************
3– बारह माही मन

साँवली ,नाजुक सी टहनी
सरल सी ,पर मन मोहक
बावरा मन दौड़ पड़ने को आतुर ।
एक बार ..सिर्फ एक.बार
स्पर्श करने की चाहत।
अनुभूतियों और दिवास्वप्नों
का सजा खंडहर सा मन
आकुलित हो बरबस
भाग उठता ,झलक भर
देखने को ….।
शायद , कहीं कोई सहज
आकर्षण उसे भी बाँधता था
एक अनदेखी डोर में बंधे।
कितने सावन आये ,
भादों बरसे ,
क्वार की सिहरन
कार्तिक में उठती बदन से थरथराहट।
अगहन में जैसे जुड़ी का ताप
ऐसे काँपता बदन और
सिसकारियों से लरजते
होंठ से निकलती भाप।
और फिर फागुन में खिलते
टेसू के दहकते फूल
अपने पूरे यौवन पर
मानों शर संधान साधा हो ।
चेत की मीठी सी पवन
आलिंगन को बैचेन मन ।
और वैशाख में उठती
हिलोर ,संग में पर्वों का मौसम।
आँख मिचोली खेलती वह
झलक दिखा तड़पा जाती।
निश्छल मन ठगा रह जाता।
अंकुआती भावनाओं संग
बह जाता।
ज्येष्ठ की तपन में ,दिखना उसका
आषाढ़ के बादलों की तरह
तरसाना।
हाँ, प्यार किया था!!
धड़कन हुई थीं तेज ।
बाँहों के बाहुपाश में
मचला ,लरजा था तन उसका।
पर इश्क को होश कहाँ..।
खो गया या कहीं धुंध में हुआ गुम
और फिर तूलिका बन शब्दों में
बिखरने लगा।तरह तरह के रंगों में
ढल अक्स उभरने लगा।
शुरुआत ही तो थी ..
सीने में धधकती आग को
बुझाने की कोशिश ।
और फिर पता लगा
प्यार ही तो था ..।
पर जीवन रुकता नहीं
साँसें थमती नहीं ।
जीते चले जाना .और
फिर रीत जाना….।
मन व्याकुल था
भाग जाना चाहता था
कोई सिरा ,कोई कोना पकड़ ..
रिश्तों के बीच ,अपने दर्द को छिपा
मुस्कान के बीच भीगी पलकों को छिपाना…।
आसान कहाँ था …होता भी कहाँ.है
भूलना किसी को ….।
***************************
.
4–संघर्ष

भटकाव , बिखराव को
समेटना
टूटे सपनों की सलीव देखना
कैसा था मंज़र
जब नये जीवन की शुरुआत करनी थी
एक जिम्मेदारी निभाने की ओर
बढ़े कदम।
तब शुरु हुआ नया संघर्ष …
जीवन संघर्ष..।
यही तो कहेंगे .
जीवन जिये जाने की शर्त
और वह भार उठाने में
बिल्कुल अनाड़ी।
कलपुर्जों के बीच सामंजस्य
बैठा दिया गया ..
कर्तव्य का अहसास ..।
भागना भी मुमकिन कहाँ..
मन की तरंग उद्वेलित होती
छटपटाहट .
सब कुछ छोड़ भाग जाने की।
पाँव की जंजीर को आरी से
काट फेंकने की तमन्ना—-
तमाम विवशताओं के बीच
झोंक दिया स्वयं को भट्टी में
तपने को ….तप कर निखरना
या राख हो खाक में मिल जाना…।
मन अक्षरों को पढ़ना चाहता था।
किसी की मदमाती नज़रों ने बाँध लिया
भागते ,पलायन करने को इच्छुक मुझको
बाँहों में अपनी थाम ही लिया।
घर ,परिवार से अलग ही दुनियाँ
खुद ही खेनी थी जिंदगी की नैया।
लगाई थी छोटी सी फुलवारी
पुष्प अंकुरित हो लुभाने लगे।
अधरों पे गीत ,नाचने लगे।
सीख ली थी कुछ अय्यारियाँ
वेश बदल जीना अलग जिंदगियाँ
अलहदा ही सही ..एक मुकाम बना।
लोगों की जुबान पर इख नाम चढ़ा।
नाकामियों ने तोड़ा जितना
उतना बढ़ते कदम ने सहेजा मुझको।
अपने मन के भीतर पर बसी थी
एक अलग ,अनोखी ही दुनियाँ
संगीत के सप्त सुरों से टकराती
लहरों सी किलकती दुनियाँ ।
आसमान के इंद्रधनुष के रंग
आँखों से उतर रहे थे धीरे धीरे
मन की अतल गहराइयों में।
जो भी था जितना भी था।
शौक ये भी पूरा किया
व्यस्त रखना था मकसद
या भूलना चाहा पहले प्यार को?

खो दिया खुद को ही पाते पाते ..
अक्षरों से हुआ लगाव ,जुड़ने लगा था।
पुस्तक प्रेम सिर चढ़ बोलने लगा था।
थी लगन और जिद …।
श्रम ने एक लंबा सफर तय किया।
मिला मार्गदर्शन ..
सीख लिया थोड़ा थोड़ा करके
जैसे नीड़ बसाया तिनका तिनका कर के।
आभासी दुनियाँ ….मायाजाल सी
भ्रमित हुआ या किया गया।
हर कदम प्रेम ,इश्क प्यार मिला।
कुछ रिश्ते जोड़े …
कुछ मन तोड़े…।
कुछ खुद को बदनाम किया।
*************************

5–जमीं पा गया

आज था सफल हुआ
पाँव नीचे जमीं पा गया।
प्रेम अंकुरण होने से पहले
सर पर छत भी आ गया।
रातरानी की मदहोश सुगंध
उसको कैसे मैं भूल गया ।
सभी कलाओं को बना पिंड
शिखर पर आज आ गया।
ख्बावों की तितलियाँ …..
रंग सुनहरे लिये
पंख फडफडाती उड़ रहीं।
स्मित अधर ,लिए चक्षु स्वप्न
निकट सन्नारियाँ
चढ सोपान ,मृदु करें हास
नीललोहित वर्ण लिये
खेल रहीं पारियाँ .
दिशा दिगंत थाम
नेहिल सा बनाती फेन
मदन को ज्यों थाम
तीक्ष्ण शर संधान
मृदुल उनके बेन ..।
पा गया वो धाम आज
शीर्ष पर बैठ, थाम
भूल अतीत के काम
नयी निर्झरिणी में
गोते लगा गया।
थकते कदम नहीं ,
अब कोई गम नहीं,
कारवां बन ..
जमाना साथ चल पड़ा।
श्रम अभी रुका नहीं.
बदन अभी थका नहीं
कलम अभी पका नहीं,
थाम उंगलियाँ ब्रश
चेहरे पे लपेटे रंग
कैनवास रोज नया
आकृति बना रहा।
पथ हुआ सुगम अब
संग चले सब कदम ।
अग्रदूत बन …..।
कहानी अभी है शेष
उद्भ्रांता वो विशेष
दबी कुछ कथा और
छिपे अश्रु अनेक
मन को मसोसती
स्मृति में धमकती
विहँसती थी जो कभी
टूटी अधरन की हँसी
झूठे नेह में गयी ठगी
मन को बहलाती रही
साथ छोड़ कर बही
अहिल्या जो त्यागी गयी
उठी पीर जो दबाती गयी।
निष्ठुरता की चरम कहानी
अंजानी थी जो कहानी
छोड़ तूलिका स्व हाथ
भँवर में घिरी रही।
किस्से बहुत सुने
रस से भरे हुये
सिगरेट के धुये संग
छल्ले बन उड़ते हुये
ढली सांझ थी ,जाम था
आंखें सुर्ख और बहकते हुये।
**********************

6- गुनहगार

जीवन के उतार चढ़ाव.
न जाने कितने ,कैसे मोड़
टेड़े मेढ़े रास्ते गुजरते
गलियों,पगडंडियों से ।
कितनी बार अवसाद
में घिरे ,टूटे और बिखरे
कितनी बार शूल चुभे ,
कितनी नज़रों के पहरे ।
गणित के सूत्र या ज्योमिती
रेखायें .
इतिहास होता अतीत
और एक अनाम खलिस ।
कितने झंझावात ,
कैसे मंज़र ..।
समीर –ठंडी हवा का झौंका
या कोई बादल समेटे स्वयं में
जैसे राहत की बूंदों के कोष
वर्जनाओं के बीच स्वयं को.
सँभाले रखने की चुनौती
एक जुनून ,
स्वयं से लड़ते रहने और
जीतने की कोशिश …
लोहे सा बन ,तपना
फिर ढलना निश्चित साँचे में
आसान तो नहीं होता !!
दुत्कार ,मन मार कर रहना
हालातों के आगे विवश होना ..
कितना ईंट ,गारा ,रेती ,पत्थर
लगता है जिंदगी बनाने में?
शायद अहसास भी न हो …!!
और फिर चढ़ता है मुलम्मा .
जो साँचे को करता है मजबूत
और इंसां ठहर जाता है
ढल जाता है एक आकार में..।
मैं…मैं भी तो वही हूँ।
जमाने की चुनौतियों से लड़ता
अपने वजूद को बचाता
एक निश्चित साँचे में ढलता ।
हाँ, आज मैं पहुँच गया हूँ उस बिंदू तक
जहाँ करनी है फिर जद्दोजहद
अपने अस्तित्व को बचाये रखने की
जो हासिल किया है ,
उसे कब्जाए रखने की
जिस के लिए पल पल तड़पा
घुट घुट के जिया
छिप छिप के रोया
और फिर समय पर छोड़ा ..।
संघर्ष से मिला
जिद ,जुनून …।
तब बना मैं ..
मैं …यानि मैं एक
निश्चित आकार ,माप में ढला
जिसे न जाने कितनी बार
छैनी ,से छीला गया
हथौड़ी से ठोका गया
चुभाई गयी कीलें
जोड़े रखने को अस्थि पंजर ।
छाँटा गया ,तराशा गया ..।
तपाया गया …।
श्वांसों में वफ़ा और सीने में
अहसास लिए
चलता रहा ,
अनवरत …।
थकता ,गिरता ,रुकता
फिर चल पड़ता ।
समेट कर अपने बिखराव को।
क्या हुआ गर इस बिखराव.को
संजोना चाहा ,किसी के प्यार से
समेटना चाहा इक भाव से ।
गुनहगार बना..।
पर नहीं ..मैं गुनहगार नहीं।
श्वांसों के लिए हवा की तरह
धड़कनों में स्पंदन भी चाहिये ।
रेशा रेशा होती जिंदगी
नेसा नेसा बिंधता हैं जब।
मुकम्मल तो इश्क से ही होता
तो किया इश्क ..।
बनाया मुरीद लोगों को अपना।
आखिर सँबल तो मुझे भी चाहिए!!
*****************************

…..7– प्रेमावतरण

प्रेम अवतरण …
इतना आसान नहीं था
शब्दों में बिखरी यादों को समेटना
रिश्तों को फिर से बुनना
टूटे रिश्तों का दर्द
खोये अपनों की टीस .
कितने तूफानों से लडना पड़ा..
सिर्फ प्रेम अवतरण हेतु।
जिंदगी के अभाव सभी तो
मिट जाते है प्रेम के अहसास मात्र से।
ऊर्जस्वित हो उठता है
हारा -विश्रृँखलित मन ।
स्फूर्ति दौड़ पड़ती है
तन के भग्नावशेषों में।
प्रेम .एक भावना है ,
अहसास …
कोमल अहसास ।
अगर वेदना जीवन की सहचरी है
तो प्रेम मल्हम है ,जिजीविषा है।
विसंगतियों के मध्य
कोमलता से सहला देना
असीम सँभावनाओं से
भर जाता है रिक्त स्थान।
प्रेम ,वह मार्ग है ,जहाँ
भूलना पड़ता है स्वत्व को
एकाकार होना पड़ता है
।मरूभूमि की शुष्कता
को महसूस कर
नीरद बनना पड़ता है ।
तब कहीं सकुचाता
अंकुआता सा
एक बिरवा सहमा सहमा सा ..
सर उठाता है हौले हौले ।
हजार बंदिशों के बीच
अपने होने के अस्तित्व
को बचाता ..।
सृष्टि प्रेममय है
फिर …
प्रेम पाप कैसे हैं?
अपराध कैसे है?
घृणित कैसे है?
कोई भाव जो..मन को
विकार रहित कर दे
प्रेरणा बन जाए ..
वह भाव ,गलत
न…न…
बिल्कुल नहीं।
प्रेम समझने के लिए
झंकृत होना जरुरी है
सारी सृष्टि का अनहद नाद
फिर स्वतः ही गूंज उठता है।
हुआ प्रेम अवतरण .
आँगन में खनकती चूडियों से
पनघट पे छनकती पायलों से
मेंहदी रचे हाथों की खुशबू से
प्रेमोन्माद में अकस्मात हुये
स्पर्श से .।
कजरारी आंखों की तिरछी चितवन से ..
बहती जाती नदिया की कल कल से
उछलती जाती हिरणी से
चाँद के अक्स से ,
…..कहाँ कहाँ नहीं है प्रेम!!
खोजा है कभी ?
पर खोजने से प्रेम नहीं मिलता
अवतरण का अहसास होता है।
वही अहसास जिया है
प्रेम अवतरण में ..
जिसके धागे का एक सिरा
मेरी ऊँगलियों से
और दूसरा सिरा तुम्हारी उंगलियों
से लिपटा है।
अलस भोर की धुंधयाती
गुनगुनाती तस्वीर .
कभी महसूस करो..
समझोगे प्रेम अवतरण को !!
प्रेम को ,
उससे उठते उस ज्वार को
जो समुद्र के उजले -अंधेरे
पक्ष का साक्षी है ।
नदी की उस धारा को देखा है
जो इठलाती उदधि से मिलने चल देती है
बिना राह के रोड़ो की परवाह किये .
बिना जताये ,बिना बताए…।
यही तो है प्रेम..।
*****************************

8–शेफाली
शेफालिका ,रातरानी
देवपुष्प ..
सुगंधित ,
मन मोहित करता वर्ण
श्वेत ..
हरीतिमा के साथ गठबंधन कर
सुबह खिलता ..
शाम को स्वतः ही
करने धरा का शृँगार
बिखर जाता।
त्याग कहोगे या समर्पण!!

शायद स्वार्थ ही कहो।
पर कहाँ फर्क पड़ता है मुझे
उन्मादिनी मैं ..
रातरानी …
अपने मन की रानी .।
न उद्भ्रांत न विकल ,
न बहकी ,न दहकी ।
शांत ,शीतल मन की स्वामिनी।
चाहो तो दर्द मिटाओ
चाहे देव चरण अर्पित करो।
नहीं छोड़ती धैर्य
न सरलता न सहजता।
बस….
स्वयं ही कर देती
स्वयं का उत्सर्ग
।समझ सकोगे मेरी भावना ?
जन्म लेना और फिर मिट जाना!!
मिटने में कितना कुछ शेष रहता है!
छटपटाहट, अधूरापन ,विकलता ..
अवसाद .।
कभी आसान नहीं हुआ मिटना।
पर मैं ..शेफाली ..।
स्वयं को मिटाती हूँ।
स्वयं की ही सेज पर ।
जिससे तुम पा सको
शीतलता..
दग्ध तन-मन में।
************************

9–पगचिह्न

जीवन की बहती धारा
समय चक्र अनुसार
थमती ,रुकती
चलती जाती है।
और छोड़ती जाती है
निशान ..
पग चिह्न ..।
या पाँव की छाप ।
कुछ अधूरे .
कुछ तिरछे
कुछ भीगे ,।
बस .ऐसे ही
छोड़ दिये हैं
अपने पीछे
कुछ निशान
जो सैलाब ले कर
उमड़ते हैं ।
कभी टीसते हैं
कभी बन मुस्कान
अधरों पर मचलते हैं।
कभी दिखता है
अव्यक्त सा डर ..!!
एक अनाम बैचेनी ।
और अक्सर
फिर घेर लेती है
तटस्थता ।
निर्लिप्तता।
सिमटते हुये
स्वयं में।
पर आश्चर्य है ..
अगस्त माह .
सभी कहते हैं
रोमांस का माह है।
रोमांटिक ।
प्रेम के देवता को
समर्पित।
तुम भी तो अगस्त
में ही आये ।
इस धरा पर।
हाथ की लकीरों में
,बंद मुट्ठी में छिपा कर।
*********************

10– प्रश्न

पूछते हैं
हुआ क्या आज तुमको
मुस्कुरा देते हैं अधर
कहें क्या और कैसे?
कितना कुछ है समोया हुआ
कहीं कहीं छितरा हुआ सा..।
एकाकीपन, बेगानापन
जैसे खुद से ही रुठा
बंजारा सा मन ।
हुआ क्या तुमको??
अंजानी पीर की लकीर
गहरे तक भेदती
उतरती चली जाती है.
हृदय के अंतस तक,
अतल गहराइयों में…।
ध्वनित होते हैं यह शब्द
बार बार,बार बार .।
और फिर गूंजते हुये
पुकारते हैं ..
तुम ——आप
कितना
आसां होता है न किसी के.लिए.
आप से तुम तक आना
और फिर अजनबीयत
का गहरा अहसास देना
वापिस तुम से आप तक आना।
एक खलिस ,एक चिढ़ ..
उन्मादी हो कर
भेद जाती है ..
जैसे किसी
बंजर होती भूमि
में ग्रिल मशीन से
छेद करना ,
जीवन रोपण की
आशा से
या फिर सब्बल लेकर
खोदना..।
मर्मांतक पीड़ा ..
उफ्…
समझ पाते तो शायद
नहीं …शायद नहीं
यकीनन समझ पाते
कुछ शब्द बन जाते हैं.
प्राणवायु और ,
जीवनौषधि!!
काश…
हुआ क्या है “आपको”
का वजन महसूस कर पाते
तो कहते
तुम ठीक हो न!!
विस्मृत परछाइयों के.
इर्द गिर्द ,शायद
पहुँच पाते …।
अव्यक्त वेदना के
उस धरातल तक
जिसे शब्द देने की
कोशिश में और
विश्रृँखलित होती जाती
वेदना ..।
पाखी
**************

11–लोग

उफ्फ…
. कितना पागल हैं लोग
कितने दीवाने हैं लोग
सानिन्ध्य की आस लगाये
चातक कितने हैं लोग ।

वाह वाह की गान उठा
हर तरफ इट शोर उठा
सामीप्य मिल जाये कैसे भी
उतावले कितने हैं लोग।

शब्द -शब्द में थाह नहीं
भाव अपरिमित चाह सही
विलक्षण हो विषमता भरे
घातक ये कितने हैं लोग ।

हर अक्षर अर्थवान जहाँ
विचार भी हैं प्रवाहमान
अहा!!चीर हृदय को जाते हैं
मतवाले कितने हैं लोग।

विरह दावानल में झुलस
प्रीत, प्रणय तब बनती है।
ध्वनित होते कुछ स्वर तब
हो जाते हैं पागल लोग।
(पागल कितने हैं लोग)

सम्मोहन नयनों में भर
जब तुम अलख जगाते हो
चुप हो जाती नश्वर काया
विमोहित कितने हैं लोग ।
पाखी

12–चेहरा

एक चेहरा ..
बहुत कुछ कहता
बहुत कुछ बोलता
पर ,
उन आती जाती लहरों सी
अनाम रेखाओं में
क्या छिपा है ..
पढ़ना और समझना
बहुत मुश्किल है।
उस ,साँवले चेहरे पर
समय ने लिखी इबारत
श्रम से ,यायावर बनाकर
ख्यालों ,ख्बावों और सपनों
को जोड़-तोड़ कर ।
लोहे संग नाता जिसका
बना देता शायद उसे भी इस्पात
पर ,
था जीवन में अनसुलझा प्रेम
बेशक हाथ में औजार ।
पर कहीं थी अदृश्य सी
प्रीत डोर भी।
जो व्यक्त करती चेहरे से
वो भाव ,
स्पंदित से होते…….।
और वह मचल उठता
स्वयं को किसी आगोश में.
खोने को आतुर ..।
वह चेहरा ।
पाखी
******************
12–मौन स्वर
-अक्सर लगता है ..
व्यवहार देख कर
जबरन जुड़ना चाहती हूँ।
पर अहमियत नहीं कोई
शायद यह भी जानती हूँ।
मन भोला है ,नहीं समझता
रवायतों को शायद।

होती है पर मौन की भी
एक परिभाषा ..।
जिसे बखूबी जानती है ,
समझती है शायद।

अपनत्व बोध दूर तलक
नहीं दिखता ।
दिखता है बस एक खालीपन।
एकाकी मन।
फिर भी न जाने किस
आस की डोर थामे।
एकटक देखा करता है
यह पाखी ,यायावर
सा मन।
पाखी
**********************

13—चुभन

दूर तलक चलता रहा
सन्नाटा साथ मेरे।
पाँव को जकड़े चल रहे
अहसास साथ मेरे।

विरहानुभूति हुई !!
प्रीत पुजारन कब सधी?
किस मोहपाश में जकड़ी
खड़ी थी जैसे हो बंधी।
चाहा बढ़ जायें कदम
बेरुखी देख कर ,पर
था कुछ भीगा सा भाव
भिगोता मुझे,साथ मेरे।।

बहुत सोचा ,किया चिंतन
ये अंधी दौड़ किस लिए?
बिना लगावट के दीप जलता
बाती की ओट किस लिए?
पल पल जलती सीली सी
लकड़ी सा तन, साथ मेरे।।

धुंध इतनी भी गहरी न थी
दिख रहा था सब कुछ साफ।
फिर भी थी कोई अंजानी सी
छाया ,धुंधयाती चलती आप।
स्पंदनों से धड़कन की गति
कहती जीते जाना ,साथ मेरे।।

कुछ तो था छिन्न भिन्न सा हुआ
असहज सा करता सदैव
कुछ तो था भीतर दरका हुआ
नस-नस में चुभता सदैव।
चुभन थी या ईर्ष्या ,जलन.
बीज बोती चल रही ,साथ मेरे।।

**********************

#14 प्रेमअवतरण

हे निर्मोही !
रे बिछोई !
प्रेम मोल न जाना ।
सुन राधिके
प्रेम अवतरण
अमूल्य होता है ।
तूने न यह जाना।
रे मोहना!
रे निष्ठुर !
प्रीत तूने लगाई ।
मैं अज्ञान बाला
प्रेम बेल तूने बोई।
रे वृंदा सी पावन
अवतरित हुआ प्रेम
बीज मन बोया
जलन, ढाह में तू खोई ।
वंशी तेरी ,चैन लूटे ,
पग घुंघरू छनक जाते ।
नाम पुकारे तेरी मुरली
पाँव रुक कहाँ पाते।
शेष है अभी जानना
प्रेम की परिभाषा
ईर्ष्या से कब मिलता
खुद की अग्नि में जल जाते।
सिखाई रीत प्रीत की तुमने
अब क्यूँ दूरी बनाई है ।
तू क्या समझे नंदन
प्रेम लता मुर्झाई रे ।
जल बिन शुष्क होती धरणी
प्रीत बिन मनवा सूखा ।
बनाया ये रिश्ता तूने
खुद ही क्यूँ टूटा ।
वेदना सहचरी प्रीत की
छलबल का क्या काम
मन से मन की डोर बँधी
फिर बीच क्यों दीवार ।
बंधन प्रीत का गीत है
विरह श्वाँस संगीत
घट घट में प्राण बन
गूँजता प्रेम गीत है।
पाखी
क्रमशः

Language: Hindi
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धर्म के रचैया श्याम,नाग के नथैया श्याम
कृष्णकांत गुर्जर
वह
वह
Lalit Singh thakur
मजा मुस्कुराने का लेते वही...
मजा मुस्कुराने का लेते वही...
Sunil Suman
बेडी परतंत्रता की 🙏
बेडी परतंत्रता की 🙏
तारकेश्‍वर प्रसाद तरुण
प्रकृति के स्वरूप
प्रकृति के स्वरूप
डॉ० रोहित कौशिक
रमेशराज के 2 मुक्तक
रमेशराज के 2 मुक्तक
कवि रमेशराज
दिमाग नहीं बस तकल्लुफ चाहिए
दिमाग नहीं बस तकल्लुफ चाहिए
Pankaj Sen
माँ वीणा वरदायिनी, बनकर चंचल भोर ।
माँ वीणा वरदायिनी, बनकर चंचल भोर ।
जगदीश शर्मा सहज
शान्त सा जीवन
शान्त सा जीवन
Dr fauzia Naseem shad
Arj Kiya Hai...
Arj Kiya Hai...
Nitesh Kumar Srivastava
" नाराज़गी " ग़ज़ल
Dr. Asha Kumar Rastogi M.D.(Medicine),DTCD
24/236. *छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
24/236. *छत्तीसगढ़ी पूर्णिका*
Dr.Khedu Bharti
वर्तमान, अतीत, भविष्य...!!!!
वर्तमान, अतीत, भविष्य...!!!!
Jyoti Khari
सीख
सीख
Ashwani Kumar Jaiswal
सियासत नहीं रही अब शरीफों का काम ।
सियासत नहीं रही अब शरीफों का काम ।
ओनिका सेतिया 'अनु '
देह माटी की 'नीलम' श्वासें सभी उधार हैं।
देह माटी की 'नीलम' श्वासें सभी उधार हैं।
Neelam Sharma
जलन इंसान को ऐसे खा जाती है
जलन इंसान को ऐसे खा जाती है
shabina. Naaz
सज्जन पुरुष दूसरों से सीखकर
सज्जन पुरुष दूसरों से सीखकर
Bhupendra Rawat
पहाड़ी भाषा काव्य ( संग्रह )
पहाड़ी भाषा काव्य ( संग्रह )
श्याम सिंह बिष्ट
ज़िंदगी...
ज़िंदगी...
Srishty Bansal
मन उसको ही पूजता, उसको ही नित ध्याय।
मन उसको ही पूजता, उसको ही नित ध्याय।
डॉ.सीमा अग्रवाल
শহরের মেঘ শহরেই মরে যায়
শহরের মেঘ শহরেই মরে যায়
Rejaul Karim
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