जीवन के अंश

*मुक्तक*
अस्तित्व हीन रहकर भी जो, आश्रय देने वाले हैं।
मरते-मरते जीवन के कुछ, अंश उन्होनें पाले हैं।
गंध विखेरा करते हैं सुंदरता शुचिता शुष्मा की।
परानंद में खो अपना सब, रहते वे मतवाले हैं।
अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ,सबलगढ(म.प्र.)

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