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जीवन का अहसास

भूख लिखूँ या प्यास लिखूँ।
जीवन का अहसास लिखूँ।।
अब अपने ही छलते हैं
बस सपने ही पलते हैं
मन के सूने आँगन में
दीप वफा के जलते हैं
पतझड बनते जीवन को
कैसे मैं मधुमास लिखूँ?
किस्से हैं कैसे कैसे
रिश्तों की क़ीमत पैसे
टूट पड़े हैं गिद्ध सभी
उतराया शव हो जैसे
हँसते चेहरों का सच
फीका रंग उदास लिखूँ।।
बिटिया की जलती होली
बेटे की लगती बोली
कहतीं बापू की आँखें
उजड़े क्यों सजकर डोली?
कल की बातों से पहले
परिचय में इतिहास लिखूँ।।
हर बातों की दो बातें
काले दिन उजली रातें
परछाईं बनकर छलती
कठपुतली सी सौगातें
बेबस लाचार पिता की
टूट गयी हर आस लिखूँ।।
भूख लिखूँ या प्यास लिखूँ।
जीवन का अहसास लिखूँ।।
?हेमन्त कुमार ‘कीर्ण’?

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