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17 Jun 2016 · 1 min read

गीतिका।सब कुछ तमासा हो गया।

गीतिका।सब कुछ तमासा हो गया ।।

आदमी खुदगर्ज़ प्यासा हो गया ।
आजकल सब कुछ तमासा हो गया ।।

फ़र्ज की होती नही परवाह अब ।
घूस खाना अब बताशा हो गया ।।

प्यार में नस्तर चुभेंगे एक दिन ।
हैं यकीं दिल को दिलाशा हो गया ।

बढ़ रही रिस्तों में नफ़रत, दूरियाँ ।
देखकर ये दिल हताशा हो गया ।।

हो रहे क़ातिल यहाँ गुमनाम सब ।
बेगुनाहों का ख़ुलासा हो गया ।।

मौत के बदले यहा बस मौत है ।
जख़्म नाजुक या जरा सा हो गया ।।

है यहाँ कोमल सभी नापाक दिल ।
पाक दिल पर तो मुँहासा हो गया ।।

हर जुबाने ब्यंग्य रूपी बाण पैने ।
मुँह नही जैसे गड़ासा हो गया ।।

सोंच क्या होगा भला’रकमिश’तेरा ।
जख़्म तेरा तो तराशा हो गया ।।

राम केश मिश्र’रकमिश’

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