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16 Sep 2022 · 1 min read

ग़लतफ़हमी है हमको हम उजाले कर रहे हैं

ग़ज़ल
ग़लतफ़हमी है हमको हम उजाले कर रहे हैं
सुख़न के नाम पर बस सफ़हे काले कर रहे हैं

सफ़र की मुश्किलें कुछ तो दिखाना भी है लाज़िम
सो रस्मन पाँव में हम ख़ुद ही छाले कर रहे हैं

हमें है भूख जीने की नहीं है पास रोटी
सो हम अब अपनी साँसों को निवाले कर रहे हैं

नहीं होंगे नसीब आँखों को अब कोई नज़ारे
सो हम आँखों को ख़्वाबों के हवाले कर रहे हैं

मेरे मशहूर करने में नहीं कुछ हाथ मेरा
कि मेरा नाम रौशन जलने वाले कर रहे हैं

हवाओं से लड़ेंगे देखना कब तक ये दीये
इन्हें हम ओट देकर तो जियाले कर रहे हैं

‘अनीस’ अब उनकी बातों पर भला क्या कान देना
सियासतदान है मस्जिद-शिवाले, … कर रहे हैं
अनीस शाह ‘अनीस’

Language: Hindi
2 Likes · 209 Views
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