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22 Feb 2024 · 1 min read

#ग़ज़ल

#ग़ज़ल
■ रह गई ठहर कर…।।
(
【प्रणय प्रभात】

★ मिलता अवसर, बनते अफ़सर।
आज भटकते हैं जो दर-दर।।

★ बिछा दिए, क़दमों में कांटे।
कहा वक़्त ने, और सफ़र कर।।

★ वक़्त के घोड़े, जम कर दौड़े।
एक घड़ी, रह गई ठहर कर।।

★ सांसो का सच, जान गया जो।
भला जिएगा, क्यूं डर-डर कर?

★ सारी दुनिया, बसा ज़हन में।
तू भी तो, इक दिल में घर कर।।

★ इनको भी, मंज़िल मिल जाती।
रहज़न अगर, ना बनता रहबर।।

★ मुट्ठी बांध, सिकन्दर आया।
आख़िर रह गए, हाथ पसर कर।।

1 Like · 31 Views
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