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19 Feb 2024 · 1 min read

ग़ज़ल

पूर्व से कुछ और काला हो गया ।
ज़िन्दगी का रंग गहरा हो गया ।

जो हुआ,अच्छा हुआ,सब ठीक है,
रात बीती और सबेरा हो गया ।

दर्द ने खोदा कुआँ दिल बीच में,
रिसते-रिसते आज दरिया हो गया ।

छीन ली शक्कर ज़फाओं ने मेरी,
हर यक़ीं का स्वाद फीका हो गया ।

कुछ न पाने की रही चाहत मेरी,
जो भी था वो और ज्यादा हो गया ।

बंद आँखों ने दिखाया सच यहाँ,
आँख खुलते ही अँधेरा हो गया ।

000
—- ईश्वर दयाल गोस्वामी

Language: Hindi
2 Likes · 66 Views
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