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20 May 2023 · 1 min read

गज़ल सी रचना

गम को भी सीने से ऐसे से लगाया है।
जैसे मुस्कान को लबों पर सजाया है।।

नन्हें नाजुक परों की तान कर चादर,
पंछी ने तूफां में अपना नीड़ बचाया है।

यूं तो गुलशन में हैं फूल तरह-तरह के,
जाने क्यों हमें गुलाब ही बहुत भाया है।

चाहे आस-पास हों परिचित से चेहरे
जो बांटे न दर्द हर वो चेहरा पराया है।

“कंचन” यही खासियत रही है तुझमें,
आग में तपकर हर बार निखर आया है।

रचनाकार :- कंचन खन्ना,
मुरादाबाद, (उ०प्र०, भारत) ।
सर्वाधिकार, सुरक्षित (रचनाकार)।
दिनांक – ०८.०१.२०१७.

1 Like · 2 Comments · 549 Views
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