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20 Nov 2022 · 1 min read

खुद को पुनः बनाना

खुद को पुनः बनाना !

बिखर गया जो कतरा-कतरा

उसको फिर से आज सजाना !

फेक दिया जो टुकड़े करके

उसे जोड़कर फिर अपनाना !

बचपन मे जैसे फूलों को

चुनती थी ,

अपने बिखरे सपनों को नित

बुनती थी ,

माँ बाबा का सपना लेकर

बैठ गई थी डोली में ,

इकतरफा कोई रिश्ता भी

अब है नहीं निभाना !

जहां प्रेम , इज्जत के बदले

गाली का उपहार मिले तो ,

अपना धीरज कभी न खोना

ना कोई उम्मीद लगाना ।

त्याग और बलिदान तुझी में

ये बातें खुद भूल न जाना ,

मगर सितम भी सहना मत तुम

दुर्गा बनकर है दिखलाना !

सांसों की लड़ियां ना टूटे

रिश्ते टूटे देर न करना ,

पतिव्रता बनने के पीछे

सती नही तुझको कहलाना !

ना करना परवाह किसी की

अपना निर्णय खुद ही करना ,

सहन शक्ति जब सीमा तोड़े

झूठे बंधन में मत रहना !

अगर उजाला कोई छीने

जो अबतक तेरे हिस्से का ,

उस अंधियारे को ठुकराकर

नई राह पर कदम बढ़ाना !

द्वार पिता का सदा खुला है

ये बातें तुम भूल न जाना ,

आस लगाए बैठी है जो

मां के सीने से लग जाना !

✍️”कविता चौहान”
स्वरचित एवं मौलिक

Language: Hindi
Tag: Hindi Kavita, Poem
3 Likes · 4 Comments · 29 Views
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