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12 Feb 2017 · 2 min read

कुँडलिया छंद

[12/2, 12:23 pm] राजेंद्र जैन ‘अनेकांत’: आज वन, वन जीव पर्यावरण से अत्यधिक प्रभावित है यहाँ तक की कई प्रजाति तो विलुप्ती के कगार पर हैं मानव ही ऐसा प्राणी मात्र है जिसकी कृपा पर इन सबकी रक्षा संभव है इसी भावना से हमने अपने भाव इस तरह रखने का प्रयास किया है सादर प्रस्तुत है….

कुंडलियाँ छंद क्.
५१

पतरिंगा

पतरिंगा पंछी सुनो,
गौरैया सम होय।
हरे रंग मे देखकर,
पहचाने सबकोय।
पहचानें सबकोय,
पर पंछी प्रेम कीजे।
जंगल वाग बचाय,
बस इन्हें बचा लीजे।
‘अनेकांत’कवि कहत,
मन हो जाए सतरंगा।
मीठी वाणी बोलत,
जब दिखजाए पतरिंगा।।
५२
भरुत

भरुत झुंड मे शीत रितु,
दिखता अपने देश।
भूमि गिरे दाना चुगे,
उड़ता ऊँची रेश।
उड़ता ऊँची रेश,
अंत दिखे बिन्दु जैसे।
मीठे मीठे बोल,
मधुर गान होय ऐसे।।
‘अनेकांत’कवि कहत,
माघ अषाढ़ नीड़ बुनत।
अंडे दो से चार,
सुन्दर पक्षी देत भरुत।
५३
भटतीतर

भटतीतर पहचानिये,
पीत बिन्दु रंग रेत।
दो घंटा जब दिन चड़े,
तब ही भोजन लेत।
तब ही भोजन लेत,
शाम सूर्य अस्त पहले।
मानव नियम भुलाय,
इसे देख याद करले।
‘अनेकांत’कवि कहत,
झाँकिए अपने भीतर।
रात्रि भोजन त्याग,
पंछी देख भटतीतर।।

राजेन्द्र’अनेकांत’
बालाघाट दि.६-०२-१७
[12/2, 1:27 pm] राजेंद्र जैन ‘अनेकांत’: पर्यावरण जीव जन्तुओं के रक्षार्थ इस तरह लिखने का प्रयास किया है शायद पागलपन हो पर क्या करें जो है सो है अतः प्रस्तुत कर रहा हुँ देखिएगा…


शकर-खोरा

कुँडलियाँ छंद क्र.
५४

शकर खोरा पक्षी दिखे,
हरे भरे मैदान।
दुर्लभ उसका गुण यही,
चंचू दाँत समान।।
चंचू दाँत समान,
इसकी बहुत प्रजाती।
ऊँची भरे उड़ान,
वन पक्षी की यह जाती।
‘अनेकांत’कवि कहत,
अभी कागज है कोरा।
भरिये कवि कागज,
लिख महत्व शकरखोरा।।

५५
महोखा

महोखा कुंकुं तो हैं,
इसके ही दो नाम।
सारे भारत मे मिले,
जंगल पर्वत थान।।
जंगल पर्वत थान,
ऊक शब्द उच्चारे।
थोड़े थोड़े समय,
कूप कूप भी पुकारे।।
‘अनेकांत’कवि कहत,
रंग चमकीला चोखा।
वन की शोभा जान,
सुंदर पक्षी महोखा।।

राजेन्द्र ‘अनेकांत’
बालाघाट दि १२०२-१७

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