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20 Jan 2017 · 1 min read

कविता

हर शाम घर लौटकर
आयने में देखकर हमें ही शर्म आने लगें,
अपनी आँखों से आँखें मिला न पाएं…..
ऐसा क्यूं जियें हम?
सूर्य बदल रहा है…
आओ, हम भी बदलें अपने आप को !
इंसान हैं हम !
*
|| पंकज त्रिवेदी |

Language: Hindi
430 Views
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