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17 Jun 2016 · 1 min read

कला और ज्ञान के

पत्रक प्रसन्न ललचायी लेखनी को देख,
फैलायी है काया चौकी पर शैय्या मान के।
आयी है प्रिया सजाने मुझे मसि द्वारा आज,
अद्भुत मैं क्षण पाया प्रेम रसपान के।
दिव्य अपना मिलन लेखनी से बोल पड़ा,
सिद्धि हेतु कलाकार और विद्यावान के।
हो गया मिलन तो सृजन भी हुआ नवीन,
पूर्ण होने लगे ग्रन्थ कला और ज्ञान के।।
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Language: Hindi
Tag: कविता
245 Views
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