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19 Jun 2023 · 1 min read

मर्द रहा

जाहिल बे-मुरव्वत दश्त-ए-नवर्द रहा
युहीं कहाँ मआसिर से नज़री-फ़र्द रहा

खौफ कैसा उसे कपड़े छीन जाने पे
जो इब्तिदा से हि मुजर्रद-ए-मर्द रहा

मुझको तो हारना हि था आख़िर में
अपने आप का मैं उम्दा हम-नबर्द रहा

यानी मिरे छाँव में राहत कोई मोल नहीं
यानी मैं हर इक मौसम बड़ा बे-दर्द रहा

इक हसीं लड़की के पीछे था बेहाल मैं
फ़ुज़ूल में थोड़ी ऐसा वैसा कूचा-गर्द रहा

मुझको पता नहीं शादाब ए राज कुनु
मिरा जीस्त इस जहां सर्द-ओ-गर्म रहा
@कुनु

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