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Jun 25, 2017 · 2 min read

ऊँच-नीच के कपाट ।

अभी तो ऊँच-नीच के कपाट हैं ।
कहीं हैं ठाटबाट ,कहीं टाट हैं।
जातिवाद की भी हैं पहेलियाँ।
चीखतीं हैं घर में सुप्त बेटियाँ।
मनमय मयूर बन मदांध फूलता।
जग-द्वंद का कुरक्ष रक्त सूँघता,
फिर कहाँ नरक को त्याग पाए हम ।
पीर की विभीषिका के पाए हम।
स्वतंत्रता निज देश में कहाँ रही ।
भ्रष्टता की दिख रही है कहकही,
औ दानवी दहेज के लिवास है।
अधीनता के ही तो आस-पास हैं ।

मुक्तपथ में ही तो राष्ट्रबोध है।
विज्ञता के मार्ग में भी शोध है ।
देवता न बाँटें तेरी वेदना ।
सद् कर्म का प्रकाश है सुचेतना ।
अब तोड दो किरीट बंधराज का ।
क्या करोगे संक्रमण की खाज का ।
तरुण है सुप्त औ ज्वलन कुकोप में।
कु जंग लग गई सजगता तोप में ।
बालकों के शीष श्रम की गाज है ।
बिना पढों का अश्रुमय समाज है ।
हम अभी भी दुख औ आत्म ह्रास हैं ।
अधीनता के ही तो आस-पास हैं ।

काटते अहं के रक्षदल का फण ।
पूजते हैं प्रेमी देव के चरण ।
पर हम्हीं नितांत क्रुद्ध -भीर बन ।
लडते नित ही श्वान-सम अधीर बन।
सोच लो कहाँ तुम्हारा राज है ।
मन के वशीभूत, सारा साज है ।
गह सद् विचार,बन न व्यर्थ खंडहर ।
दासता का बोझा खंड-खंड कर।
तभी तो छटेगी तम की रात है ।
चेतना की लौ जले तो बात है ।
वरना हम भी रक्ष दल कु ग्रास हैं ।
अधीनता के ही तो आस-पास हैं ।

निज देश भाल छू रहा विकास का ।
पर नित्य तीव्र-धूम्र छोड ह्रास का ।
फिर भी हम अचेत बन के छाँटते ।
सु देवरूपी वृक्षों को काटते।
दे रहे जो सबको प्राणवायु हैं ।
खा रहे हैं मैल ,जन की आयु हैं।
सु संतुलन बिगाड़ते है हम स्वयं ।
पर दोष दे रहे कि राज बेशरम ।
ऩ कर रहा है कुछ बहुत उदास है।
इसलिए ही जन में रोग-फाँस है ।
लग रहा है अब भी हम निरास हैं।
अधीनता के ही तो आस-पास हैं।
…………………………………….
बृजेश कुमार नायक
25-06-2017

●2013 में जे एम डी पब्लिकेशन से प्रकाशित मेरी कृति “जागा हिंदुस्तान चाहिए” काव्य संग्रह की रचना।
●2018 में उक्त कृति “जागा हिंदुस्तान चाहिए” काव्य संग्रह का द्वितीय संस्करण साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से प्रकाशित हुआ।
●उक्त रचना को साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से प्रकाशित “जागा हिंदुस्तान चाहिए” काव्य संग्रह के द्वितीय संस्करण के अनुसार परिष्कृत किया गया है।
● “जागा हिंदुस्तान चाहिए” काव्य संग्रह का द्वितीय संस्करण अमेजोन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है।

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